वामन पुराण
Vamana Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context| २२४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५१ |
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| पुलस्त्य उवाच<br>एवं वादिनि विप्रेन्द्र पार्वती भिक्षुमब्रवीत्।<br>मा मैवं वद भिक्षो त्वं हरः सर्वगुणाधिकः॥ ६५<br><br>शिवो वाप्यथवा भीमः सधनो निर्धनोऽपि वा।<br>अलङ्कृतो वा देवेशस्तथा वाप्यनलङ्कृतः॥ ६६<br><br>यादृशस्तादृशो वापि स मे नाथो भविष्यति।<br>निवार्यतामयं भिक्षुर्विवक्षुः स्फुरिताधरः।<br>न तथा निन्दकः पापी यथा शृण्वञ्शशिप्रभे॥ ६७ | पुलस्त्यजी बोले— विप्रेन्द्र! भिक्षुकके इस प्रकार कहनेपर पार्वती ने उससे कहा—भिक्षुक! तुम ऐसी बात मत बोलो। शङ्कर सब गुणोंमें श्रेष्ठ हैं। वे देवेश चाहे मङ्गलमूर्ति हों या भयङ्कर रूप, धनी हों या निर्धन तथा अलङ्कार-सम्पन्न हों अथवा अलङ्कार-विहीन—वे जैसे-तैसे ही क्यों न हों—पर वे ही मेरे स्वामी होंगे। (सहचरीको निर्देश कर) शशिप्रभे! इसे (भिक्षुकको) मना करो। यह पुनः कुछ कहना चाहता है; क्योंकि इसके ओठ फड़क रहे हैं। देखो, निन्दा करनेवाला व्यक्ति वैसा पापी नहीं होता जैसा कि निन्दाकी बात सुननेवाला होता है॥ ६५—६७॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा वरदा समुत्थातुमथैच्छत।<br>ततोऽत्यजद् भिक्षुरूपं स्वरूपस्थोऽभवच्छिवः॥ ६८<br><br>भूत्वोवाच प्रिये गच्छ स्वमेव भवनं पितुः।<br>तवार्थाय प्रहेष्यामि महर्षीन् हिमवद्गृहे॥ ६९<br><br>यच्चेह रुद्रमीहन्त्या मृण्मयश्चेश्वरः कृतः।<br>असौ भद्रेश्वरैत्येवं ख्यातो लोके भविष्यति॥ ७०<br><br>देवदानवगन्धर्वा यक्षाः किंपुरुषोरगाः।<br>पूजयिष्यन्ति सततं मानवाश्च शुभेप्सवः॥ ७१ | पुलस्त्यजी (पुनः) बोले— इस प्रकार कहकर वरदायिनी पार्वती ने (ज्यों ही) वहाँ से उठकर जाना चाहा त्यों ही शङ्कर (बनावटी) भिक्षुरूपको छोड़कर अपने वास्तविक रूपमें हो गये। वे अपने वास्तविक रूपमें आनेपर बोले—प्रिये! अपने गृह जाओ। मैं हिमवान् के घर तुम्हारे लिये महर्षियोंको भेजूँगा। रुद्रकी कामना करनेवाली तुमने यहाँ जिन पार्थिव रूपको ईश्वर माना है, वे संसारमें भद्रेश्वर नामसे प्रसिद्ध होंगे। देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, उरग एवं मनुष्य जो भी कल्याणकी कामना करनेवाले होंगे, वे सदा उनकी पूजा करेंगे॥ ६८—७१॥ | | इत्येवमुक्ता देवेन गिरिराजसुता मुने।<br>जगामाम्बरमाविश्य स्वमेव भवनं पितुः॥ ७२<br>शङ्करोऽपि महातेजा विसृज्य गिरिकन्यकाम्।<br>पृथूदकं जगामाथ स्नानं चक्रे विधानतः॥ ७३<br>ततस्तु देवप्रवरो महेश्वरः<br>पृथूदके स्नानमपास्तकल्मषः।<br>कृत्वा सनन्दिः सगणः सवाहनो<br>महागिरिं मन्दरमाजगाम्॥ ७४<br>आयाति त्रिपुरान्तके सह गणैर्ब्रह्मर्षिभिः सप्तभि-<br>रारोहत्पुलको बभौ गिरिवरः संहृष्टचित्तः क्षणात्।<br>चक्रे दिव्यफलैर्जलैन शुचिना मूलैश्च कन्दादिभिः<br>पूजां सर्वगणेश्वरैः सह विभोरद्रिस्त्रिनेत्रस्य तु॥ ७५ | मुने! शङ्करके इस प्रकार कहनेपर हिमालय-पुत्री पार्वतीजी आकाशमार्गसे अपने पिताके घर चली गयीं। महातेजस्वी शङ्कर भी पर्वतराजकी कन्याको विदाकर पृथूदक नामके तीर्थमें चले गये और वहाँ जाकर उन्होंने यथाविधि स्नान किया। उसके बाद देवोंमें प्रधान महेश्वर पृथूदकतीर्थमें स्नान करके पापसे विमुक्त होकर नन्दी, गणों एवं वाहनके सहित महान् मन्दर गिरिपर आ गये। सात ब्रह्मर्षियों (सप्तर्षियों) तथा अपने गणोंके साथ त्रिपुरासुरको मारनेवाले शङ्करके आ जानेपर पर्वतश्रेष्ठ मन्दर क्षणभरमें ही प्रसन्नचित्त हो गया। पर्वतराजने दिव्य फलों, मूलों, कन्दों एवं पवित्र जलसे समस्त गणेश्वरोंके साथ भगवान् शङ्करकी पूजा की॥ ७२–७५॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इक्यावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५१॥