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वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished489 pages

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अध्याय ५२ ] शिवजीका महर्षियोंको स्मृतकर उन्हें हिमवान्‌के यहाँ भेजना [ २२९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तद् वदध्वं यथाप्रज्ञं ज्ञातयो यूयमेव मे।<br>नोल्लङ्घ्य युष्मान् दास्यामि तत्क्षमं वक्तुमर्हथ ॥ ५४यही आपलोगोंसे निवेदन करना है। आपलोग ही मेरे ज्ञाति-बन्धु हैं, अतः अपनी बुद्धिके अनुसार परामर्श दें। आप-(के मत)-का उल्लङ्घन कर मैं (कन्याका) दान नहीं करूँगा; अतः आपलोग उचित परामर्श दें ॥ ५३-५४ ॥
पुलस्त्य उवाच<br>हिमवद्वचनं श्रुत्वा मेर्वाद्याः स्थावरोत्तमाः।<br>सर्व एवाब्रुवन् वाक्यं स्थिताः स्वेष्वासनेषु ते ॥ ५५<br>याचितारश्च मुनयो वरस्त्रिपुरहा हरः।<br>दीयतां शैल कालीयं जामाताऽभिमतो हि नः ॥ ५६<br>मेनाप्यथाह भर्तारं शृणु शैलेन्द्र मद्द्वचः।<br>पितॄनाराध्य देवैस्तैर्दत्ताऽनेनैव हेतुना ॥ ५७<br>यस्त्वस्यां भूतपतिना पुत्रो जातो भविष्यति।<br>स हनिष्यति दैत्येन्द्रं महिषं तारकं तथा ॥ ५८**पुलस्त्यजी बोले—**हिमवान्‌के प्रस्तावकी बात सुनकर मेरु आदि सभी श्रेष्ठ गिरिवरोंने अपने-अपने आसनपर आसीन होते हुए ही कहा—(गिरिराज!) याचना करनेवाले सप्तर्षि हैं और त्रिपुरासुरका वध करनेवाले शङ्कर वर हैं। शैलराज! इस कालीको आप उनके लिये प्रदान करें। जामाता हमलोगोंके मनपसंद हैं। उसके बाद मेनाने अपने पतिसे कहा—शैलेन्द्र! मेरी बात सुनिये। पितरोंकी आराधना करनेके बाद उन देवोंने (इस कन्याको) मुझे इसीलिये दिया था कि भूतपति (शिव)-द्वारा इससे जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह दैत्येन्द्र महिष एवं तारकका वध करेगा ॥ ५५-५८ ॥
इत्येवं मेनया प्रोक्तः शैलैः शैलेश्वरः सुताम्।<br>प्रोवाच पुत्रि दत्ताऽसि शर्वाय त्वं मयाऽधुना ॥ ५९<br>ऋषीनुवाच कालीयं मम पुत्री तपोधनाः।<br>प्रणामं शङ्करवधूर्भक्तिनम्रा करोति वः ॥ ६०<br>ततोऽप्यरुन्धती कालीमङ्कमारोप्य चाटुकैः।<br>लज्जमानां समाश्वास्य हरनामोदितैः शुभैः ॥ ६१<br>ततः सप्तर्षयः प्रोचुः शैलराज निशामय।<br>जामित्रगुणसंयुक्तां तिथिं पुण्यां सुमङ्गलाम् ॥ ६२<br>उत्तराफाल्गुनीयोगं तृतीयेऽह्नि हिमांशुमान्।<br>गमिष्यति च तत्रोक्तो मुहूर्तो मैत्रनामकः ॥ ६३मेना तथा पर्वतोंके इस प्रकार कहनेपर हिमवान्‌ने अपनी कन्यासे कहा—पुत्रि! अब मैंने तुझे शङ्करको दे दिया। फिर उन्होंने ऋषियोंसे कहा—हे तपोधनो! यह मेरी पुत्री तथा शङ्करकी वधू काली भक्तिसहित विनम्र-भावसे आपलोगोंको प्रणाम करती है। उसके बाद अरुन्धतीने लज्जित हो रही कालीको (अपनी) गोदमें बैठाकर शङ्करके प्रेमभरे शुभ नामोंके उच्चारणसे उसे भलीभाँति आश्वस्त किया। उसके बाद सप्तर्षियोंने कहा—शैलराज! (अब आप) जामित्र (सप्तम भावकी शुद्धता) गुणसे संयुक्त मङ्गलमय पवित्र तिथिको सुनिये। (आजके) तीसरे दिन चन्द्रमा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रसे योग करेगा। उसे मैत्र नामक मुहूर्त कहते हैं ॥ ५९-६३ ॥
तस्यां तिथ्यां हरः पाणिं ग्रहीष्यति समन्त्रकम्।<br>तव पुत्र्या वयं यामस्तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ ६४<br>ततः सम्पूज्य विधिना फलमूलादिभिः शुभैः।<br>विसर्जयामास शनैः शैलराड् ऋषिपुङ्गवान् ॥ ६५<br>तेऽप्याजग्मुर्महावेगात् त्वाक्रम्य मरुदालयम्।<br>आसाद्य मन्दरगिरिं भूयोऽवन्दन्त शङ्करम् ॥ ६६<br>प्रणम्योचुर्महेशानं भवान् भर्ताऽद्रिजा वधूः।<br>सब्रह्माकास्त्रयो लोका द्रक्ष्यन्ति घनवाहनम् ॥ ६७उस तिथिमें शङ्कर मन्त्रपूर्वक आपकी पुत्रीका पाणिग्रहण करेंगे। आप अनुमति दें; (अब) हमलोग जा रहे हैं। उसके बाद शैलराजने उन ऋषिश्रेष्ठोंको सुन्दर फल-मूलोंसे विधिपूर्वक पूजितकर विदा किया। वे ऋषि भी आकाशमार्गसे अत्यन्त वेगसे मन्दरगिरिपर आ गये और शङ्करको प्रणाम किया। उन महर्षिजनोंने पुनः महेशको प्रणाम कर कहा—शङ्कर! आप वर हैं एवं गिरिजा वधू हैं। ब्रह्माके साथ तीनों लोक आप घनवाहन (शिव)-का (इस रूपमें) दर्शन करेंगे। (—ऐसी सबकी लालसा है) ॥ ६४-६७ ॥