वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished489 pages
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| २४२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| स निमज्जन्नपि जले सामुद्रं फेनमुत्तमम्।<br>ददृशे दानवपतिस्तं प्रगृह्येदमब्रवीत्॥ ७<br><br>यदुक्तं देवपतिना वासवेन वचोऽस्तु तत्।<br>अयं स्पृशतु मां फेनः कराभ्यां गृह्य दानवः॥ ८<br><br>मुखनासक्षिकर्णादीन् सम्ममार्ज यथेच्छया।<br>तस्मिञ्छक्रोऽसृजद् वज्रमन्तर्हितमपीश्वरः॥ ९ | रथको त्यागकर पाताललोकमें चला गया। उस दानवपतिने जलमें स्नान करते हुए समुद्रके उत्तम फेनको देखा और उसे ग्रहण कर यह वचन कहा—'देवराज इन्द्रने जो वचन कहा है वह सफल हो। यह फेन मेरा स्पर्श करे।' ऐसा कहकर वह दानव दोनों हाथोंसे फेन उठाकर अपनी इच्छाके अनुसार उससे अपने मुख, नाक और कर्ण आदिका मार्जन करने लगा। उस (फेन)-में छिपे हुए इन्द्रदेवने वज्रकी सृष्टि की॥ ५–९॥ |
| तेनासौ भग्ननासास्यः पपात च ममार च।<br>समये च तथा नष्टे ब्रह्महत्याऽस्पृशद्धरिम्॥ १०<br><br>स वै तीर्थं समासाद्य स्नातः पापाद्वमुच्यत।<br>ततोऽस्य भ्रातरौ वीरौ क्रुद्धौ शुम्भनिशुम्भकौ॥ ११<br><br>उद्योगं सुमहत्कृत्वा सुरान् बाधितुमागतौ।<br>सुरास्तेऽपि सहस्राक्षं पुरस्कृत्य विनिर्ययुः॥ १२<br><br>जितास्त्वाक्रम्य दैत्याभ्यां सबलाः सपदानुगाः।<br>शक्रस्याहृत्य च गजं याम्यं च महिषं बलात्॥ १३<br><br>वरुणस्य मणिच्छत्रं गदां वै मारुतस्य च।<br>निधयः पद्मशङ्खाद्या हृतास्त्वाक्रम्य दानवैः॥ १४ | उससे उसकी नाक और मुख भग्न हो गये और वह गिर पड़ा तथा मर गया। प्रतिज्ञाके भङ्ग हो जानेसे इन्द्रको ब्रह्महत्याका पाप लगा। (फिर) वे तीर्थोंमें जाकर स्नान करनेसे पापमुक्त हुए। उसके बाद (नमुचिके मर जानेपर) शुम्भ और निशुम्भ नामके उसके दो वीर भाई अत्यन्त कुपित हुए। वे दोनों बहुत बड़ी तैयारी कर देवताओंको मारनेके लिये चढ़ आये। (फिर तो) वे सभी देवता भी इन्द्रको आगे कर निकल पड़े। उन दोनों दैत्योंने धावा बोलकर सेना और अनुचरोंके साथ देवताओंको पराजित कर दिया। दानवोंने आक्रमणकर इन्द्रके हाथी, यमके महिष, वरुणके मणिमय छत्र, वायुकी गदा तथा पद्म और शङ्ख आदि निधियोंको भी छीन लिया॥ १०–१४॥ |
| त्रैलोक्यं वशगं चास्ते ताभ्यां नारद सर्वतः।<br>तदाजग्मुर्महीपृष्ठं ददृशुस्ते महासुरम्॥ १५<br><br>रक्तबीजमथोचुस्ते को भवानिति सोऽब्रवीत्।<br>स चाह दैत्योऽस्मि विभो सचिवो महिषस्य तु॥ १६<br><br>रक्तबीजेति विख्यातो महावीर्यो महाभुजः।<br>अमात्यौ रुचिरौ वीरौ चण्डमुण्डाविति श्रुतौ॥ १७<br><br>तावास्तां सलिले मग्नौ भयाद् देव्या महाभुजौ।<br>यस्त्वासीत् प्रभुरस्माकं महिषो नाम दानवः॥ १८<br><br>निहतः स महादेव्या विन्ध्यशैले सुविस्तृते।<br>भवन्तौ कस्य तनयौ कौ वा नाम्ना परिश्रुतौ।<br>किंवीर्यौ किंप्रभावौ च एतच्छंसितुमर्हथ॥ १९ | नारदजी! उन दोनोंने तीनों लोकोंको अपने अधीन कर लिया। तब वे सभी (देवतालोग) पृथ्वीतलपर आ गये तथा उन लोगोंने रक्तबीज नामके एक महान् असुरको देखा और उससे पूछा—आप कौन हैं? उसने उत्तर दिया—विभो! मैं महिषासुरका मन्त्री एक दैत्य हूँ। मैं रक्तबीज नामसे विख्यात महापराक्रमी एवं विशाल भुजाओंवाला (दैत्य) हूँ। सुन्दर, श्रेष्ठ और विशाल भुजाओंवाले चण्ड और मुण्ड नामसे विख्यात, महिषके दो मन्त्री देवीके डरसे जलमें छिप गये हैं। महादेवीने सुविस्तृत विन्ध्यपर्वतपर हमारे स्वामी महिष नामके दानवको मार डाला है। फिर (देवताओँने पूछा—) आपलोग (हमें) यह बतलावें कि आप दोनों किसके पुत्र हैं तथा आपलोग किस नामसे विख्यात हैं? (और आप दोनों यह भी बतलावें कि) आपलोगोंमें कितना बल एवं प्रभाव है?॥ १५–१९॥ |