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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished414 pages

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अध्याय ११३ ] पृथ्वीद्वारा भगवान्‌की विभूतियोंका वर्णन [ १८१

पृथ्वीद्वारा भगवान्‌की विभूतियोंका वर्णन

नैमिषारण्यके ऋषिसत्रमें सूतजीने कहा कि एक बार श्रीसनत्कुमारजी भ्रमण करते हुए पृथ्वीसे आकर मिले और पूछा—देवि ! जिनके आधारपर तुम अवलम्बित हो तथा जिन वराहभगवान्‌से तुमने पुराणका श्रवण किया है, उसे तत्त्वपूर्वक कहनेकी कृपा करो। ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारकी बात सुनकर पृथ्वीने उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया।

पृथ्वी बोली—विप्रेन्द्र! भगवद्विभूतिका यह विषय अत्यन्त गोपनीय है। जिस समय संसारमें चन्द्रमा, अग्नि, सूर्य और नक्षत्र—इन सभीका अभाव था, सभी दिशाएँ स्तम्भित थीं, किसीको कुछ भी ज्ञान नहीं था, न पवनकी गति थी, न अग्नि और विद्युत् ही अपना प्रकाश फैला सकते थे, उस समय परम प्रभु परमात्माने मत्स्यका अवतार धारणकर रसातलसे वेदोंका उद्धार किया। फिर उन्होंने कूर्मका अवतार धारणकर अमृत प्रकट किया। हिरण्यकशिपु वर पाकर दृप्त (गर्वीला) हो गया था, उस समय भगवान्‌ने नरसिंहका अवतार धारणकर उसका संहार करके प्रह्लाद तथा विश्वकी रक्षा की। इसी प्रकार उन्होंने परशुराम तथा रामका अवतार धारणकर रावणादि दुष्टोंका संहार किया और भगवान् वामनद्वारा बलि बाँधे गये।

फिर सृष्टिके आरम्भमें जब मैं समुद्रमें डूबी जा रही थी, तब मैंने भगवान्‌से प्रार्थना की—‘जगत्प्रभो! आप सम्पूर्ण विश्वके स्वामी हैं। देवेश! आप मुझपर प्रसन्न होइये। माधव! भक्तिपूर्वक मैं आपकी शरणमें पहुँची हूँ, आप कृपा करें। सूर्य, चन्द्रमा, यमराज और कुबेर—इन रूपोंमें आप ही विराजमान हैं। इन्द्र, वरुण, अग्नि, पवन, क्षर-अक्षर, दिशा और विदिशा आप ही हैं। हजारों युग-युगान्तरोंके समाप्त हो जानेपर भी आप सदा एकरस स्थित रहते हैं। पृथ्वी-जल-तेज-वायु और आकाश—ये पाँच महाभूत तथा शब्द-स्पर्श-रूप-रस और गन्ध—ये पाँच विषय आपके ही रूप हैं। ग्रहोंसहित सम्पूर्ण नक्षत्र तथा कला, काष्ठा और मुहूर्त आपके ही परिणाम हैं। सप्तर्षिवृन्द, सूर्य-चन्द्र आदि ज्योतिष्चक्र और ध्रुव—इन सबमें आप ही प्रकाशित होते हैं। मास-पक्ष, दिन-रात, ऋतु और वर्ष—ये सब भी आप ही हैं। नदियाँ, समुद्र, पर्वत तथा सर्पादि जीवोंके रूपमें परम प्रसिद्ध आप ही सत्तावान् हैं। मेरु-मन्दराचल, विन्ध्य, मलय-दर्दुर, हिमालय, निषध आदि पर्वत और प्रधान आयुध सुदर्शन चक्र—ये सब आपके ही रूप हैं। आप धनुषोंमें शिवजीके धनुष—‘पिनाक’ हैं, योगोंमें उत्तम ‘सांख्य’ योग हैं। लोकोंके लिये आप परम परायण भगवान् श्रीनारायण हैं। यज्ञोंमें आप ‘महायज्ञ’ हैं और यूपों (यज्ञस्तम्भों)-में आप स्थिर रहनेकी शक्ति हैं। वेदोंमें आपको ‘सामवेद’ कहा जाता है। आप महाव्रतधारी पुरुषके अवयव वेद और वेदाङ्ग हैं। गरजना, बरसना आपके द्वारा ही होता है। आप ब्रह्मा हैं। विष्णो! आपके द्वारा अमृतका सृजन होता है, जिसके प्रभावसे जनता जीवन धारण कर रही है। श्रद्धा-भक्ति, प्रीति, पुराण और पुरुष भी आप ही हैं। धेय और आधेय—सारा जगत्, जो कुछ इस समय वर्तमान है, वह आप ही हैं। सातों लोकोंके स्वामी भी आपको ही कहा जाता है। काल, मृत्यु, भूत, भविष्य, आदि-मध्य-अन्त, मेधा-बुद्धि और स्मृति आप ही हैं। सभी आदित्य आपके ही रूप हैं। युगोंका परिवर्तन करना आपका ही कार्य है। आपकी किसीसे तुलना नहीं

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