वराह पुराण
Varaha Purana
by महर्षि वेदव्यास
Page 231 of 414
Read in context२२० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १२६
हुई एक भयंकर विषवाली सर्पिणी विचर रही थी। उसे देखकर मुझे क्रोध आया और फिर सहसा मैंने उसपर आक्रमण कर दिया। महाराज! इस प्रकार उसके साथ मेरा भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया। उस दिन माघमासकी द्वादशी तिथि थी। किसीने भी हमलोगोंको नहीं देखा। उस समय यद्यपि मैं युद्ध करते हुए अपने शरीरकी रक्षापर भी ध्यान रखता था; फिर भी उस सर्पिणीने मेरी नाकके छिद्रमें डँस लिया। इस प्रकार विषदिग्ध होनेपर भी मैंने उस सर्पिणीको मार ही डाला। अन्ततः हम दोनोंकी मृत्यु हो गयी। इसके बाद मैं आप (कोसलदेश राजा)-के घरमें एक राजपुत्रके रूपमें उत्पन्न हुआ। राजन्! यही कारण है कि क्रोधवश मैंने उस सर्पिणीको मार डाला था।'
राजकुमारकी बात समाप्त होते ही राजकुमारी भी कहने लगी—'महाराज! मैं ही पूर्वजन्ममें इस 'निर्माल्यकूट'-क्षेत्रमें रहनेवाली वह सर्पिणी थी। उस लड़ाईमें मरकर मैं प्राग्ज्योतिषनरेशके यहाँ कन्याके रूपमें उत्पन्न होकर आपकी पुत्रवधू हुई। राजन्! मेरी मृत्युके कारणभूत प्राक्तन तमोमय संस्कारोंकी स्मृति मेरे जीवात्मापर बनी थी, अतः मैंने भी उस नेवलेको मार डाला। प्रभो! यही वह गोपनीय रहस्य है।'
वसुंधरे! इस प्रकार पुत्रवधू और पुत्रकी बात सुनकर राजा सर्वथा निर्विण्ण हो गये और वे वहाँसे पुनः 'माया-तीर्थ' में चले गये और वहीं उनके जीवनका अन्त हुआ। उस राजकुमारी तथा राजकुमारने भी 'पुण्डरीक-तीर्थ' में पहुँचकर मनका निग्रहकर प्राणोंका त्याग किया और वे उस श्रेष्ठ स्थानपर पहुँच गये, जहाँ भगवान् जनार्दन सदा विराजमान रहते हैं। इस प्रकार राजा, राजकुमार और यशस्विनी राजकुमारी कठिन तपके द्वारा कर्मबन्धनको विच्छिन्न कर श्वेतद्वीपमें पहुँचे और उनका सारा परिवार भी महान् पुण्यके द्वारा परम सिद्धिको प्राप्तकर श्वेतद्वीप पहुँच गया।
देवि! यह मैंने तुमसे 'कुब्जाम्रक'-तीर्थकी महिमा बतलायी। इसका वर्णन मैंने उन ब्राह्मण-श्रेष्ठ रैभ्यसे भी किया था। यह बहुत पवित्र प्रसङ्ग है। चारों वर्णोंका कर्तव्य है कि वे इसका पठन एवं चिन्तन करें। इसे मूर्ख, गोहत्या करनेवाले, वेद-वेदाङ्गके निन्दक, गुरुसे द्वेष करनेवाले और शास्त्रोंमें दोष देखनेवाले व्यक्तिके सामने कभी नहीं कहना चाहिये। इसे भगवान्के भक्तों तथा वैष्णव-दीक्षा-सम्पन्न पुरुषोंके सामने ही कहना चाहिये। पृथ्वि! जो प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करता है, वह अपने कुलके आगे-पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंको तार देता है। देवि! अपने भक्तोंकी सुख-प्राप्तिके लिये मैंने 'कुब्जाम्रक-तीर्थ' के अन्तर्वर्ती स्थानोंका वर्णन किया, अब तुम दूसरी कौन-सी बात पूछना चाहती हो, वह कहो।
[ अध्याय १२६]