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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished414 pages

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अध्याय १४२ ] उपासनाकर्म एवं नारीधर्मका वर्णन [ २६१

जहाँ रहकर स्मरण किया जाय, वहीं विष्णुके स्थानकी भावना जाग उठती है। ऐसा करनेवाला मानव फिर संसारमें नहीं आता। जो व्यक्ति इसका पठन एवं श्रवण करता है, वह ब्रह्मचारी, क्रोधविजयी, सत्यवादी, जितेन्द्रिय तथा मुझमें श्रद्धा रखनेवाला, ध्यान एवं योगमें सदा रत होकर मुक्तिके फलका भागी होता है। जो इसे जानता है, वही समस्त ध्यानयोगको जानता है। वह अपने आत्मतत्त्वको प्राप्त करके परम गतिको प्राप्त कर लेता है।

[ अध्याय १४१ ]


उपासनाकर्म एवं नारीधर्मका वर्णन

पृथ्वी बोली—माधव! मैं आपकी दासी आपसे यह प्रार्थना करती हूँ कि स्त्रियोंमें प्राण और बल बहुत थोड़ा होता है, वे अनशन करने या क्षुधाके वेगको सहन करनेमें (प्रायः) असमर्थ होती हैं।

भगवान् वराह बोले—महाभागे! सर्वप्रथम इन्द्रियोंको वशमें रखकर फिर मुझमें चित्त लगाकर तथा संन्यासयोगका आश्रय लेकर सभी कर्मोंको मेरा समझता हुआ करे। फिर चित्तको एकाग्र करके अपने व्रतमें दृढ़ रहते हुए, सभी कर्म मुझे अर्पण कर दे। ऐसा करनेसे स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसक कोई भी क्यों न हो, वह जन्म-मरणरूपी संसार-बन्धनसे छूट जाता है अथवा परम गति पानेकी इच्छा हो तो ज्ञानरूपी संन्यासयोगका आश्रय ग्रहण करे। यदि प्राणीका चित्त समानरूपसे मुझमें स्थिर हो गया तो वह सब प्रकारके भक्ष्याभक्ष्य पदार्थोंको खाता हुआ, पीने योग्य अथवा अपेय पदार्थोंको पीता हुआ भी उस कर्मदोषसे लिप्त नहीं होता। मन, बुद्धि और चित्तको यदि समानरूपसे मुझमें स्थापित कर दिया तो कुछ भी कर्म करता हुआ वह ठीक उसी प्रकार उससे लिप्त नहीं होता, जैसे कमलका पत्र जलमें रहता हुआ भी जलसे अलग ही रहता है। समत्वके प्रभावसे कर्मका संयोग होते हुए भी प्राणी उससे लिप्त नहीं होता है। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। देवि! रात-दिन, एक मुहूर्त, एक क्षण, एक कला, एक निमेष अथवा एक पल भी अवसर मिल जाय तो चित्तको समरूपमें मुझमें स्थापित करना चाहिये। यदि चित्त व्यवस्थितरूपसे सम रह सके तो जो लोग दिन-रात सदा मिश्रित कर्म करते रहते हैं, उन्हें भी परम सिद्धि प्राप्त हो जाती है। जागते-सोते, सुनते और देखते हुए भी जो व्यक्ति मुझमें चित्त लगाये रखता है, उस मुझमें चित्त लगाये पुरुषको क्या भय? देवि! कोई दुराचारी चण्डाल हो या सदाचारी ब्राह्मण, इससे मेरा कोई तात्पर्य नहीं। मैं तो उसीकी प्रशंसा करता हूँ, जो सदा अनन्यचित्त है—एकमात्र मेरा भक्त है। जो सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञानी पुरुष ज्ञानरूपी संस्कारसे पवित्र होकर मेरी उपासना करते हैं, मेरे कर्ममें तत्पर रहनेवाले उन व्यक्तियोंका चित्त सदा मुझमें लगा रहता है। जो लोग अपने हृदयमें पूर्णरूपसे मुझे स्थापित करके कर्मोंका सम्पादन करते हैं, वे संसारके कर्मोंमें लगे रहनेपर भी सुखकी नींद सोते हैं। देवि! जिनका चित्त परम शान्त है, वे मेरे प्रिय पात्र हैं। कारण, वे अपने शुभ अथवा अशुभ जो भी कर्म हैं, उन सबको मुझमें अर्पण करके निश्चिन्त रहते हैं।

देवि! जिनका चित्त सदा चञ्चल रहता है, वे अधम मानव दुःखी हो जाते हैं, चञ्चल चित्त ही प्राणीका वास्तविक शत्रु है और शान्त चित्त उसके मोक्षका साधन है। अतएव वसुंधरे! तुम चित्तको

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