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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished414 pages

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Page 274

अध्याय १४३ ] मन्दारकी महिमाका निरूपण [ २६३

कौन-से कर्तव्य-कर्म हैं तथा उन मानवोंको किन लोकोंकी प्राप्ति होती है, इसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्सुकता हो गयी है, अतः आप विस्तारसे इसे बतलानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! मन्दारका रहस्य अत्यन्त गोपनीय है। एक बार जब मन्दारपर सर्वत्र पुष्प खिले हुए थे और मैं मनोविनोद कर रहा था तो एक सुन्दर पुष्पको मैंने उठाकर अपने हृदयसे लगा लिया। तबसे विन्ध्यपर्वतपर स्थित उस मन्दारमें मेरा चित्त संलग्न हो गया। वसुंधरे! ग्यारह कुण्ड उस पर्वतकी शोभा बढ़ाते हैं। सुभगे! भक्तोंपर कृपा करनेकी इच्छासे मैं उस मन्दार नामक वृक्षके नीचे निवास करता हूँ। विन्ध्यपर्वतकी तलहटीमें वह परम सुन्दर स्थान अत्यन्त दर्शनीय है। उस महान् वृक्ष मन्दारमें एक बड़े आश्चर्यकी बात है, वह भी सुनो। वह विशाल वृक्ष द्वादशी और चतुर्दशी तिथिके दिन फूलता है। वहाँ दोपहरके समयमें लोग उसे भलीभाँति देख सकते हैं। पर अन्य दिनोंमें वह किसीको दिखलायी नहीं देता। वहाँ मानव एक समय भोजन करके निवास करता है तो स्नान करते ही उसकी आत्मा शुद्ध हो जाती है और वह परम गतिको प्राप्त होता है।

देवि! उसके उत्तर भागमें 'प्रापण' नामका एक पर्वत है, जहाँ दक्षिण दिशासे होती हुई जलकी तीन धाराएँ गिरती हैं। मेरुके दक्षिण शिखरपर 'मोदन' नामका एक स्थान है और उसके पूरब और उत्तरके बीचमें 'वैकुण्ठकारण' नामका एक गुह्य स्थान है। वहाँ हल्दीके रंगकी भाँति चमकनेवाली जलकी एक धारा गिरती है। जो मानव एक रात रहकर वहाँ स्नान करता है, उसे स्वर्ग प्राप्त हो जाता है।

वहाँ जाकर वह देवताओंके साथ आनन्दका अनुभव करता है और उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं और वह अपने समस्त कुलका उद्धार कर देता है। विन्ध्यगिरिकी चोटियोंपर मेरुशिखरसे 'समस्रोत' नामकी धारा गिरकर एक गहरे तालाबके रूपमें परिवर्तित हो जाती है। वहाँ मनुष्यको चाहिये कि स्नान करके एक रात निवास करे। ऊँची शिलावाले मेरुपर्वतके पूर्वपार्श्वमें रहकर चित्तको सावधान करके जो अपने प्राणका परित्याग करता है, उसके सम्पूर्ण बन्धन कट जाते हैं और वह मेरे लोकमें चला जाता है। मन्दारके पूर्वमें 'कोटरसंस्थित' नामक स्थानमें मूसलकी आकृति-जैसी एक पवित्र जलकी धारा गिरती है। वहाँ स्नानकर पाँच दिन निवास करनेसे वह मेरुगिरिके पूर्वभागमें स्वर्ग-सुख प्राप्त करता है। पुनः वहाँ भी वह अत्यन्त कठिन कर्मका सम्पादन कर मेरे लोकको प्राप्त होता है। यशस्विनि! मन्दारके दक्षिण और पश्चिम भागमें सूर्यके समान प्रकाशमान एक जलकी धारा गिरती है। वहाँ स्नानकर मनुष्यको एक दिन-रात निवास करना चाहिये। इससे मेरुके पश्चिम भागमें ध्रुवके स्थानमें रहकर भक्तिपरायण वह मनुष्य जब भौतिक शरीरसे अलग होता है तो मेरे लोकको प्राप्त होता है। वह महान् यशस्वी मानव रहकर तथा चक्रवर्ती नरेशके समान प्राणोंका परित्याग कर मेरुके शृङ्गोंको छोड़कर मेरी संनिधिमें आ जाता है। उससे तीन कोसकी दूरीपर दक्षिण दिशामें 'गभीरक' नामक एक गुह्य स्थान है, जहाँ गहरे जलवाला एक महान् सरोवर है। वहाँ स्नानकर आठ दिनोंतक निवास करनेसे स्वच्छन्द गमन करनेकी शक्ति मिलती है और अन्तमें वह मेरे लोकको प्राप्त होता है।