वराह पुराण
Varaha Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in contextअध्याय २०७] दान-धर्मका महत्त्व ३७३
तथा दीक्षा ग्रहण करनेसे उत्तम कुलमें जन्म मिलता है। फल और मूल खाकर निर्वाह करनेवाले प्राणी राज्य एवं केवल पत्तेके आहारपर अवलम्बित व्यक्ति स्वर्ग प्राप्त करते हैं। पयोव्रत करनेसे स्वर्ग तथा गुरुकी सेवामें रत रहनेसे प्रचुर लक्ष्मी प्राप्त होती है। श्राद्ध, दान करनेके प्रभावसे पुरुष पुत्रवान् होते हैं। जो उचित विधिसे दीक्षा लेते अथवा तृण आदिकी शय्यापर शयन करके तप करते हैं, उन्हें गौ आदि सम्पत्तियाँ प्राप्त होती हैं। जो प्रातः, मध्याह्न और सायंकालमें त्रिकाल स्नानका अभ्यासी है, वह ब्रह्मको प्राप्त करता है। केवल जल पीकर तपस्या करनेवाला अपना अभीष्ट प्राप्त कर लेता है*। सुव्रत! यज्ञशाली पुरुष स्वर्ग तथा उपहार पानेका अधिकारी है। जो दस वर्षोंतक विशेष रूपसे जल पीकर ही तपस्यामें तत्पर रहते हैं तथा लवण आदि रासायनिक पदार्थोंका सेवन नहीं करते, उन्हें सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। मांस-त्यागी व्यक्तिकी संतान दीर्घायु होती है। चन्दन और मालासे रहित तपस्वी मानव सुन्दर स्वरूपवाला होता है। अन्नका दान करनेसे मानव बुद्धि और स्मरणशक्तिसे सम्पन्न होता है। छाता दान करनेसे उत्तम गृह, जूतादानसे रथ तथा वस्त्र-दान करनेसे सुन्दर रूप, प्रचुर धन एवं पुत्रोंसे प्राणी सम्पन्न होते हैं। प्राणियोंको जल पिलानेसे पुरुष सदा तृप्त रहता है। अन्न और जल—दोनोंका दान करनेके प्रभावसे प्राणियोंकी सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं। जो सुगन्धित फूलों एवं फलोंसे लदे हुए वृक्ष ब्राह्मणको दान करता है, वह सब प्रकारकी उपयोगी वस्तुओंसे भरा गृह प्राप्त करता है। सुन्दरी स्त्रियाँ और अमूल्य रत्न उस गृहमें परिपूर्ण रहते हैं। अन्न, वस्त्र, जल और रस प्रदान करनेसे व्यक्तिको दूसरे जन्ममें वे सभी सुलभ होते हैं। जो ब्राह्मणोंको धूप और चन्दन दान करता है, वह अगले जन्ममें सुन्दर तथा नीरोग होता है। जो व्यक्ति किसी ब्राह्मणको अन्न तथा सभी उपकरणोंसे युक्त गृह दान करता है, उसे जन्मान्तरमें बहुत-से हाथी, घोड़े और स्त्री-धन आदिसे परिपूर्ण उत्तम महल निवास करनेके लिये प्राप्त होते हैं। धूप प्रदान करनेसे मानवको गोलोकमें तथा वसुओंके लोकमें रहनेका सुअवसर सुलभ होता है। हाथी तथा हृष्ट-पुष्ट बैल दान करनेसे प्राणी स्वर्गमें जाता है और वहाँ उसे कभी समाप्त न होनेवाला दिव्य सुख-भोग प्राप्त होता है। घृतका दान करनेसे तेज एवं सुकुमारता तथा तैलदानसे प्राणमें स्फूर्ति और शरीरमें कोमलता उपलब्ध होती है। शहद दान करनेसे प्राणी दूसरे जन्ममें अनेक प्रकारके रसोंसे सदा तृप्त रहता है। दीपक दान करनेसे अन्धकारका कष्ट नहीं होता तथा खीर दान करनेवाले व्यक्तिका शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है। खिचड़ी दान करनेसे कोमलता और सौभाग्य प्राप्त होता है। फल दान करनेवाला व्यक्ति पुत्रवान् तथा भाग्यशाली होता है। रथ दान करनेसे दिव्य विमान तथा दर्पणोंका दान करनेसे प्राणी उत्तम भाग्य प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं। डरे हुए प्राणीको अभय प्रदान करनेसे मनुष्यकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। [अध्याय २०७]
* ज्ञानविज्ञानमारोग्यं रूपसौभाग्यसम्पदः । तपसा प्राप्यते भोगो मनसा नोपदिश्यते ॥
एवं प्राप्नोति पुण्येन मौनेनाज्ञां महामुने । उपभोगांस्तु दानेन ब्रह्मचर्येण जीवितम् ॥
अहिंसया परं रूपं दीक्षया कुलजन्म च । फलमूलाशनो राज्यं स्वर्गः पर्णाशिनां भवेत् ॥
पयोभक्ष्या दिवं यान्ति जायते द्रविणाढ्यता । गुरुशुश्रूषया नित्यं श्राद्धदानेन संततिः ॥
गवाद्याः कालदीक्षाभिर्ये तु वा तृणशायिनः । स्वयं त्रिपवणाद् ब्रह्म त्वपः पीत्वेष्टलोकभाक् ॥
(२०७। ३८-४२)
कर्मविपाकका इसी प्रकारका परम सुन्दर वर्णन ब्रह्मपुराण अध्याय २१७ में भी प्राप्त होता है।