वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (origin)
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Read in context( १०८ ) वेदान्तसार । माणसे ही जिसप्रकार अद्वितीय ब्रह्मका प्रतिपादन कियाहै उसविषयमें अन्य प्रमाण का नामभी नहीं लियाहै। जिस प्र- करणमें जो वस्तु प्रतिपादन करने योग्य हो उस प्रकरणमें उसी वस्तुका अथवा उस वस्तुके अनुष्ठानका श्रवण करना फल कहाता है जैसा कि उसी षष्ठाध्यायमें लिखाहै "आ- चार्य्यवान् पुरुष ब्रह्मके जाननेमें समर्थ होताहै वही ज्ञानी पुरुष विमुक्त पर्यन्त प्रतीक्षा करताहै और विमुक्ति होनेपर परब्रह्ममें लीन होजाताहै" इस प्रकार अद्वितीय ब्रह्म- ज्ञानका ब्रह्मप्राप्ति होनेमें प्रयोजन है। ऐसा श्रुतिमें कहाहै। जिस प्रकरणमें जो वस्तु प्रतिपादक करने योग्य हो उस वस्तु- की प्रशंसाका नाम अर्थवाद है। जैसा कि उसी षष्ठ अध्याय में कहाहै। गुरु शिष्यको कहते हैं हे शिष्य! तूने हमसे जिसका प्रश्न कियाहै उसको सुन। नहीं सुने हुये पदार्थका श्रवण क- रना, भूले हुये पदार्थका स्मरण करना; नहीं जाने हुये पदार्थका जानना। इस प्रकार उस अद्वितीय ब्रह्म वस्तुकी प्रशंसा कही- है। जिस प्रकरणमें जो वस्तु प्रतिपादन करने योग्य हो उस प्रकरण उसी वस्तुके प्रतिपादन की युक्तिका नाम उपपत्ति है। जैसा कि उसी षष्ठाध्यायमें कहाहै कि "हे सौम्य! जिस प्रकार एक मृत्तिकाके पिण्डका ज्ञान होनेपर संपूर्ण मृत्तिकाके पात्रा- दिकोंका ज्ञान हो जाताहै मृत्तिकाकी कम्बुग्रीवादि विकृति और नाम कहना मात्र है यथार्थ मृत्तिकाही है। इसी प्र-