BharatKosha
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished145 pages

Page 113 of 145

Read in context
Page 113

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ११३ ) ति । अयं च द्विविधः चिरकालाभ्यस्तपटुतरसविकल्पकस- माध्यनुभवजनितसंस्कारसहकृतायाः चित्तवृत्तेर्ज्ञात्रादित्रिपु- टीलयपूर्वकमद्वैतवस्तुन्येकभावनात्मकः । प्रथमः एतन्निर्विक- ल्पकसमाध्यभ्यासपाटवेन लुप्तसंस्कारतया ज्ञात्रादित्रिपुटी- लयपूर्वकमखंडाकारितायाः चित्तवृत्तेर्विनापिस्वस्फूर्तिकेवलाचि दात्मना च स्थानात्मकॊ द्वितीयः। तत्र द्वितीयपक्षमभिप्रेत्याह । ज्ञातृज्ञानादीति । नन्वेवं समाधिसुषुप्त्योर्विक्षेपाभावेन वृत्त्य- भानादभेदमाशंक्य परिहरति । तत्र युक्तिमाह । उभयत्रेति । समाधिसुषुप्त्योरित्यर्थः । तत्सद्भावेति समाधावज्ञायमानवृत्ति- सद्भावात् सुषुप्तौ वृत्त्यभावाच्च तयोर्भेदोपपत्तेरित्यर्थः ॥ ९२ ॥ (भा०टी०) ज्ञाता ज्ञान और जानने योग्य वस्तु तीन पदार्थोंका भेद ज्ञानका अभाव होनेपर अद्वितीय ब्रह्मव- स्तुमें अखण्डाकार चित्तकी वृत्ति होना निर्विकल्पक समा- धि कहाताहै । इस समाधिके समय जिस प्रकार जलमें मिले हुए लवणके लवणत्व ज्ञानका अभाव होनेपर केवल जलका ज्ञान होताहै तिसी प्रकार अद्वितीय ब्रह्माकार चित्तवृत्तिके ज्ञानकी सत्ताका अभाव होनेपर भी ब्रह्म वस्तुमात्र ज्ञान रहताहै अर्थात् अखण्ड ब्रह्ममें चि- त्तवृत्तिके लीन होनेपर और भिन्नरूप कुछ ज्ञान नहीं होताहै अखण्ड ब्रह्ममय ज्ञानही होताहै इसी कारण सु- षुप्ति अवस्थासे निर्विकल्पक समाधिका भेद कोई भेद नहीं है इस प्रकार आशंकाभी नहीं होतीहै क्योंकि सुषुप्ति