वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (origin)
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Read in contextसंस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । (११७) भावादित्येतदपि निरस्तं बोद्धव्यम् ॥ संप्रति धारणां लक्षयति । अद्वितीयवस्तुनीति । सर्वेषां बुद्धिसाक्षितया विद्यमाने व- स्तुनि चित्तनिक्षेपणं धारणा इत्यर्थः । धारणपाटवाभावेन चित्तस्थैर्याभावादद्वितीयवस्तुनि विच्छिद्यविच्छिद्यचित्त- वृत्तिप्रवाहकरणं ध्यानमित्याह। तत्रेति। समाधिरुक्त एव सवि- कल्पकः स्मर्तव्य इत्याह । समाधिरिति ॥ ९३ ॥ ( भा० टी० ) यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्या- हार, धारणा, ध्यान और समाधि ये सम्पूर्ण निर्विकल्पक समाधिके अङ्ग हैं। अहिंसा, सत्य, चोरीका त्याग, ब्रह्मचर्य्य और अपरिग्रह इन सबके धारणका नाम यम है। पवित्रता, सन्तोष, तपस्या, अध्ययन और ईश्वरप्रणिधान इनको नियम कहतेहैं। हस्तपादादिके संस्थान विशेष जो स्वस्तिक पत्र इत्यादि हैं सो आसन कहातेहैं। रेचक, पूरक, कुम्भकरूप प्राण वायुके निग्रह करनेके उपायका नाम प्राणायाम है। श- ब्दादि विषयोंसे श्रवणादि इन्द्रियोंका हटाना प्रत्याहार कहाताहै। अद्वितीय ब्रह्म वस्तुमें अन्तःकरणके अभिनि- वेशका नाम धारणा है। अद्वितीय ब्रह्मवस्तुमें चित्तवृत्तिके प्रवाहका नाम ध्यान है। पूर्वोक्त सविकल्पक समाधिका ना- म समाधि है ॥ ९३ ॥ एवमस्याङ्गिनो निर्विकल्पकस्य लयविक्षेपकषाय- रसास्वादलक्षणाश्चत्वारो विघ्नाः सम्भवन्ति । लयस्तावत् अखण्डवस्त्वनवलम्बनेन चित्तवृत्ति-