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वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished145 pages

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( १२३ ) (भा०टी०) जिससमय चित्त पूर्वोक्त चार प्रकारके विघ्नोंसे रहित होकर वायुरहित स्थानमें स्थित दीपककी तरह अचलहुआ केवल अखण्ड चैतन्यमात्रकी चिन्तामें तत्पर होता है उस समय चित्तका निर्विकल्पक समाधि कहाता है श्रुतिके प्रमाणसेभी जाना जाता है- "लयरूप विघ्न उपस्थित होनेपर अन्तःकरणमें उद्बोधकको उत्पन्न करै अन्तःकरणके विक्षेपरूप विघ्नके तिरस्कृत होनेपर उसको शान्त करै । कषायरूप विघ्नयुक्त हुए चित्तको जानकर निवृत्त रक्खै। जिस समय अखण्ड ब्रह्म वस्तुमें प्रणिधान होय उससमय अन्तःक- रणको चलायमान न करै । उस समय कोई सविकल्पक आनन्द आस्वादन न करै। और प्रज्ञाद्वारा निःसंग होजायहै। इस विषयमें स्मृतिका प्रमाणभी है- "जिसप्रकार दीपक वायु- रहित स्थानमें स्थित होकर निश्चल रहता है तिसीप्रकार प्र- णिधान होनेपर अन्तःकरण निश्चल होता है" ॥ ९५ ॥ अथ जीवन्मुक्तलक्षणमुच्यते । जीवन्मुक्तो नाम स्वस्वरूपाखण्डे ब्रह्मणि साक्षात्कृते सति अज्ञात- तत्कार्य्यसञ्चितकर्म्मसंशयविपर्य्ययादीनामपिबा धितत्वादखिलबन्धरहितो ब्रह्मनिष्ठः । "भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्म्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे"। इत्यादिश्रुतेः॥९६॥ (सं०टी०) ध्यानधारणासमाधित्रयं मनोविषयत्वात्सम्प्र- ज्ञातसमाधेरंतरंगं यमादिकंतुबहिरंगं तथाचकेनापि पुण्येनांतरंगे