वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (origin)
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Read in contextसंस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( १२७ ) श्रय इत्यन्वयः। स क इत्यपेक्षायामाह । य इति । यः कोपि महापुरुषो ब्रह्मात्मैकत्वसाक्षात्कारेण निरस्तसमस्तभेदबुद्धिः सुषुप्त्यवस्थायां यथा द्वैतं न पश्यति तथा ब्रह्मदृष्टिदार्थ्येन जाग्रदवस्थायामपि द्वैतं न पश्यति तद्दृष्ट्या ब्रह्मव्यतिरि- क्तजडपदार्थाभावात्स तथोक्तः किंच कदाचित् व्युत्थान- दशायामाविद्यकसंस्कारलेशवशाद्भिक्षाटनादिव्यवहारेण द्वयं पश्यन्नपि समाध्यभ्याससामर्थ्यवशादद्वयत्वेन पश्यति स तथो- क्तः यश्च लोकसंग्रहार्थं नित्यादिकर्माणि कुर्वन्नपि आत्मनि कर्तृत्वाभावनिश्चयेन निष्क्रियः कर्मरहितो भवति कर्मफलेन न लिप्यते स जीवन्मुक्तो नात्र संशयः कर्तव्य इत्यर्थः ॥९७॥ ( भा०टी० ) जिसप्रकार साधारण पुरुष इंद्रजालके प- दार्थोंको देखकर विचार करता है कि ये इंद्रजालके पदार्थ प्रकृत दृश्यमान पदार्थ नहीं हैं । तिसीप्रकार जीवन्मुक्त पुरुष जाग्रदवस्थामें रुधिर, मांस, विष्ठा, मूत्रादिकोंका भाण्ड ऐसे शरीरद्वारा, अन्धापन, बहिरापन इत्यादि दोषोंका भाण्ड ऐसे इन्द्रियोंके द्वारा, और भूख, प्यास, शोक, मोह इत्यादि भाण्ड ऐसे अन्तःकरणद्वारा, पहिली वासनासे उत्पन्न हुए ज्ञानके विरोधी सञ्चित कर्मोंका फल भोगनेके अनन्तर दृश्यमान यह जगत् सत्य वस्तु नहीं होय है. इसप्रकार विचार करता है। इस विषयमें श्रुतिकाभी प्रमाण है-“जीवन्मुक्त पुरुष बाह्य वस्तुमें नेत्रयुक्त होकर नेत्रहीनकासा व्यवहार करता है, कर्ण