वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (origin)
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Read in contextसंस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( १९) विद्याध्यारोपितमिथ्यानानापदार्थनिषेधमुखेनोपलक्षितमखंड चैतन्यमेव पुनः “सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म” इत्यादिश्रुतिमनुसृत्य लक्षणयाविधिमुखेनाप्युपदिशतीति भावः । तत्र श्रुतिमाह । तस्मा इति ॥ २४ ॥ ( भा०टी० ) यह वेदान्तशास्त्रका अधिकारी जन्ममर- णरूप संसाराग्निसे सन्तप्त होकर समिधादि उपहार हाथमें ले- कर जिस प्रकार किसी पुरुषका शिर जलनेलगै है और वह जलाशयको जाय है इसीप्रकार वेदान्तके पारदर्शी ब्रह्मवेत्ता गुरुके समीप जाकर गुरुकी सेवा करै क्योंकि श्रुतिने ऐसा कहा है—“ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुके समीप जाय” परम कृपालु गुरु भी अध्यारोप और अपवाद न्यायद्वारा अर्थात् अखण्ड ब्र- ह्मस्वरूपका विधिवाक्योंद्वारा उपदेश नहीं होसके है इस कारण ( नेह नानास्ति किञ्चन ) इत्यादि श्रुतियोंका अनुस- रण करके अविद्या करके भासित मिथ्या नाना पदार्थोंके नि- षेधद्वारा और ( सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ) इत्यादि श्रुतियोंका अनुसरण करके लक्षणाकरके विधिवाक्योंद्वारा शिष्यको उपदेश करे क्योंकि श्रुतिमें भी कहा है—“जिस विद्याके द्वारा सच्चिदानन्दमात्र पूर्णब्रह्मका परिज्ञान होय ब्रह्मवेत्ता गुरु उसही ब्रह्मविद्याद्वारा शिष्यको उपदेश करे” ॥ २४ ॥ असर्पभूते रज्जौ सर्पारोपवद्वस्तुन्यवस्त्वारोपः। वस्तु सच्चिदानन्दमद्वयं ब्रह्म । अज्ञानादिसकलजडस- मूहः अवस्तु । अज्ञानं तु सदसद्भ्यामनिर्वचनीयं