वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (origin)
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Read in context( ३० ) वेदान्तसार । न्यके प्रकाशद्वारा सुखको भोगता है"स्मरणकेप्रमाणसेभी जा- ना जाता है क्योंकि जब पुरुष शयन करके उठता है तब ऐसा कहता है कि'आजमें जिस समय सुखकी निद्रामें सो रहा था तब मुझको कुछ खबर नहीं थी' ॥ ३० ॥ अनयोर्व्यष्टिसमष्टयोर्वनवृक्षयोरिव ज- लाशयजलयोरिव चाभेदः ॥ ३१ ॥ (सं०टी०)तदानीमीश्वरगतमूलाज्ञानस्यजीवगतसंस्कारमा त्रावशिष्टाज्ञानस्य च समष्टिव्यष्टयभिप्रायेण भेदभानेपि वस्तुतो भेदो नास्तीत्येतत्सदृष्टांतमाह । अनयोरिति ॥ ३१ ॥ ( भा०टी० ) जिस प्रकार वृक्षकी समष्टि सहित वनका और वनकी व्यष्टिसहित वृक्षका कुछ भेद नहीं है, और जैसे जलकी समष्टिसहित जलाशयका और जलाशयकी व्यष्टि सहित जलका कोई भेद नहीं है तिसी प्रकार अज्ञान समष्टिसहित अज्ञानव्यष्टिकाभी कोई भेद नहीं है ॥ ३१ ॥ एतदुपहितयोरीश्वरप्राज्ञयोरपि वनवृक्षावच्छिन्ना- काशयोरिव जलाशयजलगतप्रतिबिम्बाकाशयो- रिव चाभेदः। “एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोन्तर्या- म्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ” इत्यादिश्रुतेः ॥ ३२ ॥ ( सं०टी० ) उक्तोपाधिद्वारेणेश्वरप्राज्ञयोरप्यभेदं दृष्टांत- मुखेन दर्शयति । एतदुपहितयोरिति । ईश्वरस्य वनावच्छि- न्नाकाशवत्प्राज्ञस्य वृक्षावच्छिन्नाकाशवच्च तथा स्थूलजलाश-