वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (origin)
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Read in contextसंस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत। (६१) वदभेदः। एवं पञ्चीकृतपञ्चभूतेभ्यः स्थूलप्रपञ्चो- त्पत्तिः॥ ६० ॥ (सं०टी०) अनयोर्विश्ववैश्वानरयोर्वनवृक्षावच्छिन्नाका- शदृष्टांतेन जलाशयगतप्रतिबिंबाकाशदृष्टांतेन च पूर्ववदभेदं सा- धयति। अत्रापीति। स्थूलप्रपंचोत्पत्तिमुपसंहरति। एवमिति ६० (भा०टी०) जैसे वन और वृक्षमें वनावच्छिन्न आका- श और वृक्षावच्छिन्न आकाशमें तथा जलाशयमें और जल में और तालाब प्रतिबिम्बित आकाश और जलप्रतिबिम्बित आकाशमें कुछ भेद नहीं है तिसीप्रकार स्थूलशरीरकी समष्टि और व्यष्टिसे तथा स्थूलशरीरकी समष्टिगत उपहित वैश्वानर और स्थूलशरीरकी व्यष्टिगत उपहित विश्वकाभी कुछ भेद नहीं है इसप्रकार इकट्ठे कियेहुए पञ्चभूतसे स्थूलशरीरकी उत्पत्ति होती है ॥ ६० ॥ एतेषां स्थूलसूक्ष्मकारणशरीरप्रपञ्चानां समष्टिरे- को महान्प्रपञ्चो भवति। यथा अवान्तरवनानां समष्टिरेकं महद्वनम्। यथावाअवान्तरजलाशयानां समष्टिरेको महाजलाशयः। तदुपहितविश्ववैश्वान- रादीश्वरपर्यन्तं चैतन्यमपि अवान्तरवनावच्छि- न्नाकाशवदवान्तरजलाशयगतप्रतिबिम्बिताका- शवच्च एकमेव ॥ ६१ ॥ (सं०टी०) स्थूलसूक्ष्मकारणप्रपंचानां व्यष्टिभूतानां प्र- त्येकं विवक्षयाऽवांतरप्रपंचत्वमभिधायेदानीं तेषां समष्टिरेवैकं