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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

by भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी

Source: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished256 pages

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विज्ञानभैरव : १६५ की शक्ति में समावेश अर्थात् तन्मयता प्राप्त हो जाती है, तो इस तन्मयीभाव को ही यहाँ 'क्षेत्र' कहा जाता है। इस भैरव शास्त्र में अद्वय दृष्टि की प्रधानता के कारण कुरुक्षेत्र प्रभृति द्वैत दृष्टि के पोषक तीर्थ स्थानों को क्षेत्र नहीं माना जाता। निर्वचन पद्धति से क्षेत्र वह कह- लाता है, जो सभी तरह के पाशों को नष्ट करने वाला हो और समस्त प्राणियों की इस संसार रूपी भय से रक्षा कर सकता हो। अनाश्रित शिव में समाविष्ट हो जाने पर ही पशु प्रमाता सभी पाशों से मुक्त हो सकता है और इस संसार रूपी महाभय से त्राण पा सकता है। अतः 'क्षेत्र' पद से अनाश्रित शिव-शक्ति में पशु प्रमाता की स्थिति का ही बोध होगा, कुरुक्षेत्र प्रभृति तीर्थ स्थानों का नहीं, क्योंकि उनमें निवास करने वाला तो द्वैत स्थिति में ही पड़ा रह जाता है। इस प्रकार देवी के द्वारा किये गये जप, ध्यान, पूजा, तर्पण, होम, याग, क्षेत्र विषयक प्रश्नों का अद्वय नय के अनुसार समाधान प्रस्तुत कर भगवान् भैरव कहते हैं कि परम तत्त्व परमार्थतः अद्वय है, एक ही है। ऊपर बताई गई भावनात्मक पद्धति के सिवाय दूसरी कोई विधि नहीं है, जिसके अनुसार कि जप, पूजा आदि कर्मकाण्ड सम्पन्न हो सकें। पूजन, तर्पण आदि कर्म भी तो उस अद्वय तत्त्व से भिन्न नहीं है। ऐसी अवस्था में किससे किसकी पूजा की जायगी और कौन किससे तृप्त होगा ? पूज्यपूजकभाव और तर्प्यतर्पकभाव द्वैत दृष्टि में ही सम्भव हो सकता है, अतः इस अद्वय नय में भावना के सिवाय इनकी कोई पृथक् सत्ता नहीं है ॥१४७-१४८॥ स्वतन्त्रानन्दचिन्मात्रसारः स्वात्मा हि सर्वतः । आवेशनं तत्स्वरूपे स्वात्मनः स्नानमीरितम् ॥१४९॥ हि यतः, स्वात्मा सर्वतः स्वतन्त्रानन्दचिन्मात्रसारः, अतस्तस्मिन् स्वात्मस्वरूपे स्वात्मन आवेशनमेव स्नानमीरितम् । निगदितधारणाभ्यासेनाद्वैतस्वात्मस्वरूपस्य स्वतन्त्रानन्दचिन्मात्रसारतयाऽनुभवात् तत्स्वरूपे लयभावनैव मुख्यं स्नानमित्यर्थः ॥१४९॥ "यागक्षेत्रादि किं कथम्" (श्लो० १४१) इस श्लोक में आये आदि पद से स्नान का ग्रहण किया गया है। सदाचार में स्नान का प्रमुख स्थान है, अतः अद्वय नय के अनुसार प्रस्तुत श्लोक में स्नान की व्याख्या की गई है। ऊपर जिन धारणाओं का वर्णन किया गया है, उनमें से किसी एक के अभ्यास से अद्वय स्वभाव आत्मा के सब तरह से स्वतन्त्र, आनन्द, चिन्मात्र- स्वरूप का साक्षात्कार होने पर उसी में समाविष्ट हो जाने की स्थिति को ही यहाँ स्नान कहा जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि स्वात्मस्वरूप वस्तुतः स्वतन्त्र है। इसका यह स्वरूप आनन्द और ज्ञानमय है। अपने इस स्वाभाविक स्वरूप में उक्त धारणाओं के अभ्यास से साधक लीन हो जाता है। जैसे स्नान करने के लिये नदी, जलाशय आदि के जल में डुबकी लगाई जाती है, उसी तरह से इस आन्तर स्नान में भी साधक स्वात्मस्वरूप में डुबकी लगाता है। उसकी यह लीनावस्था ही अद्वय शास्त्र में स्नान के नाम से कही जाती है ॥१४९॥