विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
by भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी
Source: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (origin)
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Read in context( ३३ ) के द्वारा आविष्कृत कौलिक योग-विधि में पिण्ड, पद, रूप और रूपातीत—इन चार तत्त्वों का वर्णन है । यह योग-विधि जैन योगशास्त्र के ग्रन्थों में भी मिलती है । कुण्डलिनी योग का बौद्ध वज्रयानी साहित्य में भी नामान्तर से वर्णन मिलता है । षोडश नित्याओं की उपासना और प्राण-चार विधि में कालचक्र यान का और त्रिक दर्शन की अनुपाय प्रक्रिया में सहज यान का स्वरूप देखा जा सकता है । गोरक्ष प्रभृति नाथ योगियों के सम्प्रदाय में नेति, धौति प्रभृति यौगिक षट्कर्म विधियों तथा विविध बन्धों का परिचय मिलता है । इन्हीं सब यौगिक विधियों की शाखा-प्रशाखाएँ भारतवर्ष के विविध भागों में सहज, अवधूत, बाउल, पंचसखी, सन्त, सिक्ख, दरवेश प्रभृति नामों से आज भी प्रचलित हैं । इस पूरी परम्परा का समावेश योगशास्त्र में होता है । महर्षि पतंजलि के द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग का उपयोग मुख्यतः चित्त की वृत्तियों को, अर्थात् मन को नियन्त्रित करने के लिए किया जाता है । योग की सर्वोत्तम परिभाषा भी यही मानो जा सकती है । अष्टांग योग के अभ्यास से मनुष्य न केवल शारीरिक चेष्टाओं, किन्तु मन की नाना प्रकार की वृत्तियों पर भी अपना नियन्त्रण स्थापित कर लेने में समर्थ हो जाता है । बौद्ध, वैष्णव और शैव तन्त्र ग्रन्थों में अष्टांग योग के स्थान पर षडंग योग का विधान है । इसमें पातंजल योग के यम, नियम और आसन—इन तीन अंगों को छोड़ दिया गया है । बौद्ध तन्त्रों में अनुस्मृति को और वैष्णव, शैव तन्त्रों में तर्क को योग के अंग के रूप में मान्यता मिली है । योग के क्षेत्र में ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि उत्कृष्ट मानवीय गुणों को अपने में समेटे हुए यम-नियम नाम के अंगों का निष्कासन भारतीय इतिहास की एक शोचनीय घटना रही है । इसीलिए १म० म० पी० वी काणे को लिखना पड़ा कि तान्त्रिक षडंग योग से यम-नियम को इस लिये छोड़ दिया गया कि ये पंच मकार वाली दृष्टि के विरुद्ध पड़ते थे । हम आसनों के बिना योग की कल्पना ही नहीं कर सकते । योग के अंग के रूप में यम, नियम और आसन शारीरिक और मानसिक परिष्कार की पहली सीढ़ी हैं, जब कि षडंग योग का प्रयोजन मनुष्य की रागात्मक वृत्तियों का परिष्कार करना था । षडंग योग अनुपाय प्रक्रिया में बताया गया है कि यहाँ साधक उपाय के रूप में केवल सत्तर्क का सहारा लेता है ! षडंग योग में तर्क को भी योग का अंग माना गया है । शैव, वैष्णव, बौद्ध सभी सम्प्रदायों में षडंग योग की चर्चा मिलती है । गुह्यसमाज तन्त्र (१८।१४०) में प्रत्या- हार, ध्यान, प्राणायाम, धारणा, २अनुस्मृति और समाधि—ये छः योग के अंग माने गये हैं । १. धर्मशास्त्र का इतिहास (हिन्दी संस्करण), पंचम खण्ड उत्तरार्ध, पृ० २९-३० । २. अनुस्मृति का अर्थ 'बार बार स्मरण' अथवा अनुरूप स्मृति है । पालि अभिधर्म साहित्य में इसका विस्तार से वर्णन मिलता है । संक्षिप्त परिचय के लिए आचार्य नरेन्द्रदेव कृत ग्रन्थ 'बौद्ध-धर्म-दर्शन' का पाँचवाँ अध्याय देखिये ।