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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

by महर्षि याज्ञवल्क्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished782 pages

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व्यवहाराध्यायः ३५७ साहसान्दण्डनीयः । तत्रापि तिर्यगादिषु मूल्यविशेषेण वर्णविशेषेण राजप्रत्या- सत्तिविशेषेण १दण्डस्य लघुगुरुभावः कल्पनीयः ॥ २४२ ॥ भाषा—जो अल्पज्ञानी वैद्य ( नीम हकीम ) पशु-पक्षियों की झूठी चिकित्सा करता हो उसे प्रथम साहस का दण्ड होता है, मनुष्य की चिकित्सा करे तो मध्यम साहस का और राजपुरुष की चिकित्सा करने पर उत्तम साहस का दण्ड होता है ॥ २४२ ॥ अबन्ध्यं यश्च बध्नाति बद्धं यश्च प्रमुञ्चति । अप्राप्तव्यवहारं च स दाप्यो दममुत्तमम् ॥ २४३ ॥ यः पुनर्बन्धनानर्हमनपराधिनं राजाज्ञया बिना बध्नाति, यश्च बद्धं व्यव- हारार्थमाहूतं अनिवृत्तव्यवहारं चोत्सृजति, असौ उत्तमसाहसं दाप्यः ॥ २४३ ॥ भाषा—जो बन्धन के अयोग्य व्यक्ति को राजा की आज्ञा के बिना बांधता है और जो बद्ध ( व्यवहार के लिये पकड़कर लाये गए चोर आदि ) को व्यवहार की निवृत्ति के पूर्व ही छोड़ देता है वह उत्तम साहस के दण्ड का भागी होता है ॥ २४३ ॥ मानेन तुलया वापि योऽशमष्टमकं हरेत् । दण्डं स दाप्यो द्विशतं वृद्धौ हानौ च कल्पितम् ॥ २४४ ॥ यः पुनर्वणिक् व्रीहिकार्पासादेः पण्यस्याष्टममंशं कूटमानेन कूटतुलया वा अन्यथा वा परिहरति असौ पणानां द्विशतं दण्डनीयः । अपहृतस्य द्रव्यस्य पुनर्वृद्धौ हानौ च दण्डस्यापि वृद्धिहानी कल्प्ये ॥ २४४ ॥ भाषा—नापने या तौलने में जो धूर्तता करके किसी वस्तु का आठवाँ भाग ले ले तो उससे दो सौ पण दण्ड लेना चाहिए । अपहृत धन के अधिक या कम होने के अनुसार दण्ड भी कम या अधिक होता है ॥ २४४ ॥ भेषजस्नेहलवणगन्धधान्यगुडादिषु । पण्येषु प्रक्षिपन्हीनं पणान्दाप्यस्तु षोडश ॥ २४५ ॥ भेषजमौषधद्रव्यम् , स्नेहो घृतादिः, लवणं प्रसिद्धम् , गन्धद्रव्यमुशीरादि, धान्यगुडौ प्रसिद्धौ, 'आदि' शब्दाद्धिङ्गुमरिचादि, एतेष्वसारं द्रव्यं विक्रयार्थं मिश्रयतः षोडशपणो दण्डः ॥ २४५ ॥ भाषा—औषध, घृत आदि द्रवपदार्थ, नमक, गन्ध, धान्य और गुड़ आदि में विक्रय द्वारा अधिक लाभ पाने के लिये असार द्रव्य डालने पर ( मिलावट करने पर ) सोलह पण दण्ड लेवे ॥ २४५ ॥ १. दण्डानां । २. हीनं क्षिपतः पणा दण्डस्तु ।