याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
by महर्षि याज्ञवल्क्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
DevanagariSanskritpublished782 pages
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७१२ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
| श्लोकाः | पृष्ठम् | श्लोकाः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| परस्य योषितं हृत्वा | ४९४ | पिण्डांस्तु गोऽजविप्रेभ्यो | १२१ |
| पराशरव्यासशङ्ख | ३ | पिण्याकं वा कणान्वापि | ५३० |
| परिभूतामधःशय्यां | २८ | पिण्याकाचामतक्राम्बु | ६३१ |
| परिशुष्यत्स्खलद्वाक्यो | ५७८ | पितरि प्रोषिते प्रेते | २०७ |
| परिस्कृते शुचौ देशे | १०२ | पिता पितामहो भ्राता | २५ |
| परेण भुज्यमानायाः | १८६ | पितापुत्रविरोधे तु | ३५५ |
| पर्णोदुम्बरराजीव | ६२६ | पितुरूर्ध्वं विभजतां | २७९ |
| पलं सुवर्णाश्चत्वारः | १५९ | पितुः स्वसारं मातृश्व | ५०७ |
| पलाण्डुं विड्वराहं च | ७७ | पितृद्रव्याविरोधेन | २७३ |
| पवित्रपाणिराचान्तः | १०१ | पितृपात्रं तदुत्तानं | १११ |
| पवित्राणि जपेत्पिण्डान् | ६३४ | पितृपुत्रश्वस्रुआतृ | ३५४ |
| पशुमण्डूकनकुल | ६५ | पितृभ्यः स्थानमसीति | १०५ |
| पशून्गच्छन्शतं दाप्यो | ३८१ | पितृभ्यां यस्य यद्दत्तं | २७९ |
| पश्चाच्चंवापसरता | ३८७ | पितृमातृपतिभ्रातृ | ३०१ |
| पश्चात्तापो निराहारः | ४२९ | पितृमातृपराश्चैव | ९९ |
| पश्यतोऽब्रुवतो भूमेः | १८४ | पितृमातृसुतत्यागः | ५०९ |
| पश्येच्चारांस्ततो दूतान् | १४७ | पितृमातृसुतभ्रातृ | ३६ |
| पाखण्ड्यनाश्रिताः स्तेनाः | ३९६ | पितृयानोऽजवीथ्याश्च | ४८६ |
| पाणिपादशलाकाश्च | ४५६ | पितृलोकं चन्द्रमसं | ४८९ |
| पाणिप्रक्षालनं दत्त्वा | १०३ | पितॄंश्च मधुसर्पिर्भ्यां | ४४ |
| पाणिग्राह्यः सवर्णासु | २५ | पितॄणां तस्य तृप्तिः स्यात् | ६४१ |
| पात्राणां चमसानां च | ८० | पितॄन्मधुघृताभ्यां च | १६ |
| पात्रे धनं वा पर्याप्तं | ५२३ | पित्तात्तु दर्शनं पक्ति | ४५३ |
| पात्रे प्रदीयते यत्तत्सकलं | ४ | पित्रोस्तु सूतकं मातुः | ४०८ |
| पादकेशांशुककरो | ३४७ | पिशुनानृतिनोश्चैव | ७१ |
| पादशौचं द्विजोच्छिष्टं | ९४ | पीडाकर्षाशुकावेष्ट | ३४७ |
| पादौ प्रतापयेन्नाग्नौ | ६३ | पीड्यमानाः प्रजा रक्षेत् | १५० |
| पारदारिकचौरं वा | ३८५ | पुण्यात्षड्भागमादत्ते | १४९ |
| पारदार्यं पारिवित्र्यं | ५०९ | पुत्रपौत्रैर्ऋणं देयं | २०७ |
| पार्श्वकाः स्थालकैः सार्धं | ४२७ | पुत्रं श्रेष्ठ्यं च सौभाग्यं | १२४ |
| पालदोषविनाशे तु | ३१७ | पुत्रान्देहि धनं देहि | १३२ |
| पालितं वर्धयेन्नीत्या | १४२ | पुत्रोऽनन्याश्रितद्रव्यः | २०८ |
| पालो येषां न ते मोच्याः | ३१६ | पुनरावर्तिनो बीज | ४८६ |
| पावकः सर्वमेध्यस्त्वं | २८ | पुनर्धात्रीं पुनर्गर्भं | ४५५ |
| पांसुप्रतर्षे दिग्दाहे | ६६ | पुनःसंस्कारमर्हन्ति | ५३२ |
| पिण्डदोऽशहरश्चैषां | २८७ | पुमान्संग्रहणे ग्राह्यः | ३७७ |
| पिण्डयज्ञावृता देयं | ४०३ | पुराणन्यायमीमांसा | ३ |