यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध बारहवां अध्याय ओषधियां रोग पर वैसे ही आक्रमण करती हैं, जैसे चोर गायों के बाड़े पर आक्रमण करते हैं. ओषधियां शरीर के समस्त रोगों और विकारों को नष्ट करती हैं. ( ८४ ) यदिमा वाजयन्नहमोषधीर्हस्त ऽ आदधे. आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीवगृभो यथा.. ( ८५ ) जैसे वधगृह में ले जाया जा रहा प्राणी वहां पहुंचने से पहले ही अपने को मरा हुआ मान लेता है, वैसे ही इन शक्तिशाली ओषधियों को लेने से पहले हम जब हाथ में रखते हैं, तो राजयक्ष्मा जैसे भीषण रोग भी भाग जाते हैं. ( ८५ ) यस्यौषधीः प्रसर्पथाङ्गमङ्गं परुष्परुः. ततो यक्ष्मं वि बाधध्व ऽ उग्रो मध्यमशीरिव.. ( ८६ ) जब ओषधि कठोर शरीर के अंगप्रत्यंग में पसरती ( फैलती ) है तो यक्ष्मा आदि भयंकर रोगों को भी पूरी तरह समाप्त कर देती है. ( ८६ ) साकं यक्ष्म प्र पत चाषेण किकिदीविना. साकं वातस्य ध्राज्या साकं नश्य निहाकया.. ( ८७ ) ओषधि लेने के साथ ही यक्ष्मा रोग दूर हो जाता है. प्राणवायु की तरह ओषधि के शरीर में व्याप्त होने के साथ ही शेष रोग भी नष्ट हो जाता है. ( ८७ ) अन्या वो अन्यामवत्वन्यान्यस्या ऽ उपावत. ताः सर्वाः संविदाना ऽ इदं मे प्रावता वचः.. ( ८८ ) हे ओषधियो! आप एक दूसरे के प्रभाव को बढ़ाने की कृपा कीजिए. सभी ओषधियां परस्पर सहयोग और हमारे इन वचनों को सुनने की कृपा करें. ( ८८ ) याः फलिनीर्या ऽ अफला ऽ अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः. बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्व ँहसः.. ( ८९ ) फल वाली, फलहीन, पुष्पहीन, पुष्पवती, बहुत उत्पन्न होने वाली ओषधियां हमें रोगों से मुक्त कराने की कृपा करें. ( ८९ ) मुञ्चन्तु मा शपथ्यादथो वरुण्यादुत. अथो यमस्य पड्वीशात्सर्वस्माद्देवकिल्बिषात्.. ( ९० ) हे ओषधियो! आप हमें कुपथ्य और दूषित जल से होने वाले विकारों से मुक्त कीजिए. आप हमें छहों अनुशासन न पालने से उत्पन्न विकारों से भी मुक्त करने की कृपा कीजिए. ( ९० ) अवपतन्तीरवदन्दिव ऽ ओषधयस्परि. यं जीवमश्नवामहै न स रिष्याति पूरुषः.. ( ९१ ) १५४ - यजुर्वेद