यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध बारहवां अध्याय त्वां गन्धर्वा ऽ अखनँस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः. त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान् यक्ष्मादमुच्यत.. (९८) गंधर्वों, इंद्र देव व बृहस्पति देव ने ओषधियों का खनन किया. राजा सोम ने ओषधियों का खनन किया. वे राजा और विद्वान् हैं. उन्होंने यक्ष्मा रोग से मुक्त किया. ( ९८ ) सहस्व मे अरातीः सहस्व पृतनायतः. सहस्व सर्वं पाप्मान १७ सहमानास्योषधे.. (९९) हे ओषधियो! आप शरीर के सभी शत्रुओं को दूर करने में समर्थ हैं. उन्हें दूर करने की कृपा कीजिए. हे ओषधियो! आप अपनी सामर्थ्य से हमें सभी कष्टों से मुक्त कराने की कृपा कीजिए. ( ९९ ) दीर्घायुस्त ऽ ओषधे खनिता यस्मै च त्वा खनाम्यहम्. अथो त्वं दीर्घायुर्भूत्वा शतवल्शा विरोहतात्.. (१००) हे ओषधि! आप का खनन करने वाले दीर्घायु हों. मैं भी आप का खनन करता हूं. मैं भी दीर्घायु होऊं. आप भी दीर्घायु होने की कृपा करें. सैकड़ों अंकुरों से युक्त होने की कृपा करें. ( १०० ) त्वमुत्तमास्योषधे तव वृक्षा ऽ उपस्तयः. उपस्तिरस्तु सोस्माकं यो अस्माँ २ अभिदासति.. (१०१) हे ओषधि! आप उत्तम हैं. आप के समीप वाले वृक्ष आप के लिए कल्याणकारी हों, जो हमारे प्रति दुर्भावनामय हों, वे भी आप की कृपा से हमारे अनुकूल हो जाएं. ( १०१ ) मा मा हि १७ सीज्जनिता यः पृथिव्या यो वा दिव १७ सत्यधर्मा व्यानट्. यश्चापश्चन्द्राः प्रथमो जजान कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१०२) जो पृथिवी के जन्मदाता हैं, जो स्वर्गलोक के रचयिता हैं, जो आदिपुरुष हैं, जो सत्यधर्मा हैं, हम उन के प्रति कभी भी विपरीत न हों. हम कभी भी उन के प्रतिकूल न रहें. जो प्रथम जन्मा है, उस के अलावा हम अन्य किस देव को अपनी आहुति अर्पित करें. ( १०२ ) अभ्यावर्त्तस्व पृथिवि यज्ञेन पयसा सह. वपां ते अग्निरिषितो अरोहत्.. (१०३) हे पृथिवी! यज्ञ से होने वाली बरसात के साथ आप हमारे अनुकूल होने की कृपा कीजिए. आप अग्नि पर आरोहण करने की कृपा कीजिए. ( १०३ ) अग्ने यत्ते शुक्लं यच्चन्द्रं यत्पूतं यच्च यज्ञियम्. तद्देवेभ्यो भरामसि.. (१०४) १५६ - यजुर्वेद