यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय विराडसि दक्षिणा दिग्रुद्रास्ते देवा ऽ अधिपतय ऽ इन्द्रो हेतीनां प्रतिधर्त्ता पञ्चदशस्त्वा स्तोमः पृथिव्या १४ श्रयतु प्र उगमुक्थमव्यथायै स्तभ्नातु बृहत्साम प्रतिष्ठित्या ऽ अन्तरिक्ष ऽ ऋषयस्त्वा प्रथमजा देवेषु दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथन्तु विधर्त्ता चायमधिपतिश्च ते त्वा सर्वे संविदाना नाकस्य पृष्ठे स्वर्गे लोके यजमानं च सादयन्तु.. (११) हे इष्टके! आप विराट् हैं और दक्षिण दिशा स्वरूप हैं. रुद्र आप के देव व इंद्र देव अधिपति हैं. आप प्रतिधारणकर्ता हैं. पंचदश स्तोम आप को पृथिवी पर प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. प्रउग उक्थ आप को स्थिर व सुदृढ़ करें. बृहत्साम आप को अंतरिक्ष में स्थापित करें. ऋषिगण दिव्यलोक में स्थापित करें. वे प्रथम उत्पन्न देव को सब देवों में स्थापित करें. वे दिव्यलोक में स्थापित करें. वे प्रथम उत्पन्न देव को सब देवों में स्थापित करें. (११) सम्राडसि प्रतीची दिगादित्यास्ते देवा ऽ अधिपतयो वरुणो हेतीनां प्रतिधर्त्ता सप्तदशस्त्वा स्तोमः पृथिव्या १४ श्रयतु मरुत्वतीयमुक्थमव्यथायै स्तभ्नातु वैरूप १४ साम प्रतिष्ठित्या ऽ अन्तरिक्ष ऽ ऋषयस्त्वा प्रथमजा देवेषु दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथन्तु विधर्त्ता चायमधिपतिश्च ते त्वा सर्वे संविदाना नाकस्य पृष्ठे स्वर्गे लोके यजमानं च सादयन्तु.. (१२) हे इष्टके! आप पश्चिम दिशा के सम्राट् हैं. आदित्य आप के देवता हैं. वरुण आप के अधिपति हैं. आप प्रतिधारणकर्ता हैं. सप्तदश स्तोम दिशा के सम्राट् हैं. मरुत् उक्थ दिशा के सम्राट् हैं. वैरूप साम दिशा के सम्राट् हैं. वह अंतरिक्ष में दृढ़ता हेतु आप को प्रतिष्ठित करें. सृष्टि क्रम में प्रथम जन्मे ऋषि आप को देवलोक में स्थित करें. इस तरह समस्त वसु आदि देवता याजकों को सुखसंपन्न स्वर्गलोक में ले जाएं. (१२) स्वराडस्युदीची दिङ्मरुतस्ते देवा ऽ अधिपतयः सोमो हेतीनां प्रतिधर्त्तैकवि १४ शस्त्वा स्तोमः पृथिव्या १४ श्रयतु निष्केवल्यमुक्थमव्यथायै स्तभ्नातु वैराज १४ साम प्रतिष्ठित्या ऽ अन्तरिक्ष ऽ ऋषयस्त्वा प्रथमजा देवेषु दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथन्तु विधर्त्ता चायमधिपतिश्च ते त्वा सर्वे संविदाना नाकस्य पृष्ठे स्वर्गे लोके यजमानं च सादयन्तु.. (१३) हे इष्टके! आप स्वयं प्रकाशमान हैं. आप उत्तर दिशा स्वरूप हैं. मरुद्गण दिक्पालक हैं. सोम अधिपति हैं. सोम प्रतिधारक हैं. एकविंश स्तोम आप को पृथिवी पर प्रतिष्ठित करें. निष्केवल्य स्तोम आप को पृथिवी पर प्रतिष्ठित करें. वैराज साम स्तोम आप को पृथिवी पर प्रतिष्ठित करें. पहले प्रादुर्भूत ऋषिगण समस्त दिव्यलोक में श्रेष्ठ दैवी गुणों को प्रसारित करें. वांछित निष्पादक और ये प्रमुख उच्च स्वर्गलोक में यजमान को निस्संदेह स्थित करें. अधिपति भी आप को विस्तार दें. इस तरह वे समस्त १८४ - यजुर्वेद