BharatKosha
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 46 of 421

Read in context
Page 46

तीसरा अध्याय समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम्. आस्मिन् हव्या जुहोतन.. (१) हे यजमानो! आप समिधा से अग्नि को प्रज्वलित करने व उस को जगाने की कृपा कीजिए. हे यजमानो! आप अतिथि से अग्नि को प्रज्वलित करने व उस में हवि प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( १ ) सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन. अग्नये जातवेदसे.. (२) हे यजमानो! आप समिधाओं से अच्छी तरह प्रज्वलित सर्वज्ञ अग्नि में पवित्र घी की आहुति प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( २ ) तं त्वा समिद्भिद्यिरो घृतेन वर्धयामसि. बृहच्छोचा यविष्ठ्य.. (३) हे अग्नि! हम आप को समिधाओं व घी से प्रज्वलित कर बढ़ाते हैं. आप विशाल जौमयी ज्वालाओं से ऊंचे और प्रकाशित होने की कृपा कीजिए. ( ३ ) उप त्वाग्ने हविष्मतीर्घृताचीर्यन्तु हर्यत. जुषस्व समिधो मम.. (४) हे अग्नि! हवि एवं घृत वाली आहुतियां आप तक पहुंचें, आप का मन हरें. आप हमारे द्वारा भेंट की गई समिधाओं को स्वीकार करने की कृपा करें. ( ४ ) भूर्भुवः स्वद्यौरिव भूम्ना पृथिवीव वरिम्या. तस्यास्ते पृथिवि देवयजनि पृष्ठेग्निमन्नादमन्नाद्यायादधे.. (५) हे अग्नि! आप भू, भुव ( अंतरिक्ष ) और स्वर्गलोक में विद्यमान हैं. पृथ्वी यज्ञ करने के लिए श्रेष्ठ स्थान प्रदान करती है. हम उसी पृथ्वी पर यज्ञ करने के लिए उस से पूर्व यज्ञ-वेदिका पर अग्नि को स्थापित करते हैं. हम अन्न से बल और स्वर्गलोक से दिव्यता धारण करें. हम पृथ्वी के समान महिमा प्राप्त करें. ( ५ ) आयं गौः पृश्निरक्रमीदसद्न् मातरं पुरः. पितरं च प्रयन्स्वः.. (६) अग्नि देव सर्वत्र भ्रमणशील व बहुरंगी लपटों वाले हैं. वह पृथ्वी माता के पास आसन पर विराजमान हैं. यज्ञ में वह प्रयत्नपूर्वक स्वर्गलोक पिता के पास पहुंच गए हैं. ( ६ ) ४६ - यजुर्वेद

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित) · Page 46 of 421 · BharatKosha