यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextछठा अध्याय देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. आ ददे नार्यसी दमह ६ह रक्षसां ग्रीवा ऽ अपि कृन्तामि. यवोसि यवयास्मद् द्वेषो यवयारातीर्दिवे त्वान्तरिक्षाय त्वा पृथिव्यै त्वा शुन्धन्ताँल्लोकाः पितृषदनाः पितृषदनमसि.. ( १ ) हे यज्ञ साधनो! आप देवताओं के नायक हैं. हम आप को सविता द्वारा प्रेरित अश्विनीकुमारों की बांहों से ग्रहण करते हैं. हम आप को पूषा देव के हाथों से ग्रहण करते हैं, जो आर्य नहीं हैं. ( आप आइए ) आप उन राक्षसों की गरदनों पर प्रहार कीजिए. आप हमारे मित्र हैं. आप हमारे द्वेषियों को हम से दूर करने की कृपा कीजिए. हम स्वर्गलोक, अंतरिक्ष व पृथ्वी के लिए आप को पवित्र करते हैं. आप हमारे लिए पिता की तरह हैं. आप का घर हमारे लिए पिता के घर की तरह है. ( १ ) अग्रेणीरसि स्वावेश ऽ उन्नेत्तृणामेतस्य वित्तादधि त्वा स्थास्यति देवस्त्वा सविता मध्वानक्तु सुपिप्पलाभ्यस्त्वौषधीभ्यः. द्यामग्रेणास्पृक्ष ऽ आन्तरिक्षं मध्येनाप्राः पृथिवीमुपरेणादृ ६ह हीः... ( २ ) हे यज्ञ साधनो! आप अग्रणी हैं. आप अपनी जिम्मेदारी मान कर सब को उन्नति की ओर अग्रसर कीजिए. सविता देव जगत् के स्वामी हैं. वे आप को सुफल ओषधियों से भूषित करने की कृपा करें. आप स्वर्गलोक की ऊंचाइयों को छुएं. श्रेष्ठ विचारों से अंतरिक्षलोक को पूर्ण कर दीजिए. आप श्रेष्ठ कर्मों से पृथ्वी को ओतप्रोत करने की कृपा कीजिए. ( २ ) या ते धामान्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिश्रृङ्गा ऽ अयासः. अत्राह तदुरुगायस्य विष्णोः परमं पदमव भारि भूरि. ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि रायस्पोषवनि पर्यूहामि. ब्रह्म दृ ६ह ह क्षत्रं दृ ६ह ह्यायुर्दृ ६ह ह प्रजां दृ ६ह ह.. ( ३ ) विष्णु का जो धाम है, वह सूर्य की किरणों से प्रकाशित है. वह धाम सर्वव्यापक है. हम विष्णु के उस श्रेष्ठ धाम को पाने की इच्छा रखते हैं. आप ७४ - यजुर्वेद