यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextतृतीय अध्याय ६९ अर्जुन! मनुष्य न तो कर्मों को न आरम्भ करने से निष्कर्मता की अन्तिम स्थिति को प्राप्त होता है और न आरम्भ की हुई क्रिया को त्यागने मात्र से भगवत्प्राप्तिरूपी परमसिद्धि को ही प्राप्त होता है। अब तुझे ज्ञानमार्ग अच्छा लगे या निष्काम कर्ममार्ग, दोनों में कर्म तो करना ही पड़ेगा। प्रायः इस स्थल पर लोग भगवत्पथ में संक्षिप्त मार्ग और बचाव ढूँढ़ने लगते हैं। “कर्म आरम्भ ही न करें, हो गये निष्कर्मी”- कहीं ऐसी भ्रान्ति न रह जाय, इसलिये श्रीकृष्ण बल देते हैं कि कर्मों को न आरम्भ करने से कोई निष्कर्म-भाव को नहीं प्राप्त होता। शुभाशुभ कर्मों का जहाँ अन्त है, परम निष्कर्मता की उस स्थिति को कर्म करके ही पाया जा सकता है। इसी प्रकार बहुत से लोग कहते हैं, “हम तो ज्ञानमार्गी हैं, ज्ञानमार्ग में कर्म है ही नहीं।”- ऐसा मानकर कर्मों को त्यागनेवाले ज्ञानी नहीं होते। आरम्भ की हुई क्रिया को त्यागने मात्र से कोई भगवत्साक्षात्काररूपी परमसिद्धि को प्राप्त नहीं होता है; क्योंकि- न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥५॥ कोई भी पुरुष किसी भी काल में क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रहता; क्योंकि सभी पुरुष प्रकृति से उत्पन्न हुए गुणों द्वारा विवश होकर कर्म करते हैं। प्रकृति और प्रकृति से उत्पन्न गुण जब तक जीवित हैं, तब तक कोई भी पुरुष कर्म किये बिना रह ही नहीं सकता। अध्याय चार के तैंतीसवें और सैंतीसवें श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि यावन्मात्र कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं। ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्म कर देती है। यहाँ वे कहते हैं कि कर्म किये बिना कोई रहता ही नहीं। अन्ततः वे महापुरुष कहते क्या हैं? उनका आशय है कि यज्ञ करते-करते तीनों गुणों से अतीत हो जाने पर मन के विलय और साक्षात्कार के साथ यज्ञ का परिणाम निकल आने पर कर्म शेष हो जाते हैं। उस निर्धारित क्रिया की पूर्णता से पहले कर्म मिटते नहीं, प्रकृति पिण्ड नहीं छोड़ती।