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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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तृतीय अध्याय ९३ कर्मयोग कैसे है? कर्म का स्वरूप भी स्पष्ट नहीं है, जिसे किया जाय; क्योंकि 'यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है'- अभी तक उन्होंने इतना ही बताया। यज्ञ तो बताया नहीं, कर्म का स्वरूप स्पष्ट कहाँ हुआ? हाँ, युद्ध का यथार्थ चित्रण गीता में यहीं पाया जाता है। सम्पूर्ण गीता पर दृष्टिपात करें तो अध्याय दो में कहा कि शरीर नाशवान् है, अतः युद्ध कर। गीता में युद्ध का यही ठोस कारण बताया गया। आगे ज्ञानयोग के सन्दर्भ में क्षत्रिय के लिये युद्ध ही कल्याण का एकमात्र साधन बताया और कहा कि यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोग के विषय में कही गयी। कौन-सी बुद्धि? यही कि हार-जीत दोनों दृष्टियों में लाभ ही है, ऐसा समझकर युद्ध कर। फिर अध्याय चार में कहा कि योग में स्थित रहकर हृदय में स्थित अपने इस संशय को ज्ञानरूपी तलवार द्वारा काट। वह तलवार योग में है। अध्याय पाँच से दस तक युद्ध की चर्चा तक नहीं है। ग्यारहवें अध्याय में केवल इतना कहा कि ये शत्रु मेरे द्वारा पहले से ही मारे गये हैं, तू निमित्त मात्र होकर खड़ा भर हो जा। यश को प्राप्त कर। ये तुम्हारे बिना भी मारे हुए हैं, प्रेरक करा लेगा। तू इन मुर्दों को ही मार। अध्याय पन्द्रह में संसार सुविरूढ़ मूलवाला पीपल वृक्ष-जैसा कहा गया, जिसे असंगतारूपी शस्त्र द्वारा काटकर उस परमपद को खोजने का निर्देश मिला। आगे के अध्यायों में युद्ध का उल्लेख नहीं है। हाँ, अध्याय सोलह में असुरों का चित्रण अवश्य है, जो नरकगामी हैं। अध्याय तीन में ही युद्ध का विशद चित्रण है। श्लोक ३० से श्लोक ४३ तक युद्ध का स्वरूप, उसकी अनिवार्यता, युद्ध न करनेवालों का विनाश, युद्ध में मारे जानेवाले शत्रुओं के नाम, उन्हें मारने के लिये अपनी शक्ति का आह्वान और निश्चय ही उन्हें काटकर फेंकने पर बल दिया। इस अध्याय में शत्रु और शत्रु का आन्तरिक स्वरूप स्पष्ट है, जिनके विनाश की प्रेरणा दी गयी है। अतः- ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे 'शत्रुविनाशप्रेरणा' नाम तृतीयोऽध्यायः॥३॥