यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
Page 130 of 429
Read in context॥ ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ ॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥ अध्याय तीन में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने आश्वस्त किया कि दोषदृष्टि से रहित होकर जो भी मानव श्रद्धायुक्त हो मेरे मत के अनुसार चलेगा, वह कर्मों के बन्धन से भली प्रकार छूट जायेगा। कर्मबन्धन से मुक्ति दिलाने की क्षमता योग (ज्ञानयोग तथा कर्मयोग, दोनों) में है। योग में ही युद्ध-संचार निहित है। प्रस्तुत अध्याय में वे बताते हैं कि इस योग का प्रणेता कौन है? इसका क्रमिक विकास कैसे होता है? श्रीभगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥१॥ अर्जुन! मैंने इस अविनाशी योग को कल्प के आदि में विवस्वान् (सूर्य) के प्रति कहा, विवस्वान् ने मनु से और मनु ने इक्ष्वाकु से कहा। किसने कहा? मैंने। श्रीकृष्ण कौन थे? एक योगी। तत्त्वस्थित महापुरुष ही इस अविनाशी योग को कल्प के आरम्भ में अर्थात् भजन के आरम्भ में विवस्वान् अर्थात् जो विवश हैं, ऐसे प्राणियों से कहता है। सुरा में संचार कर देता है। यहाँ सूर्य एक प्रतीक है; क्योंकि सुरा में ही वह परम प्रकाशस्वरूप है और वहीं उसके पाने का विधान है। वास्तविक प्रकाशदाता (सूर्य) वहीं है। यह योग अविनाशी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि इसमें आरम्भ का नाश नहीं होता। इस योग का आरम्भ भर कर दें तो यह पूर्णत्व दिलाकर ही शान्त होता है। शरीर का कल्प औषधियों द्वारा होता है; किन्तु आत्मा का भजन से होता है। भजन का आरम्भ ही आत्म-कल्प का आदि है। यह साधन-भजन भी किसी महापुरुष की ही देन है। मोहनिशा में अचेत आदिम मानव, जिसमें