Skip to content
BharatKosha
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

Page 133 of 429

Read in context
Page 133

९८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता अभी तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने किसी महापुरुष द्वारा योग का आरम्भ, उसमें आनेवाले व्यवधान और उनसे पार पाने का रास्ता बताया। इस पर अर्जुन ने प्रश्न किया- अर्जुन उवाच अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥४॥ भगवन्! आपका जन्म तो ‘अपरम्’- अब हुआ है और मेरे अन्दर सुरा का संचार बहुत पुराना है, तो मैं कैसे मान लूँ कि इस योग को भजन के आदि में आपने ही कहा था? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले- श्रीभगवानुवाच बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥५॥ अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। हे परंतप! उन सबको तू नहीं जानता; किन्तु मैं जानता हूँ। साधक नहीं जानता, स्वरूपस्थ महापुरुष जानता है, अव्यक्त की स्थितिवाला जानता है। क्या आप सबकी तरह पैदा होते हैं? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, स्वरूप की प्राप्ति शरीर-प्राप्ति से भिन्न है। मेरा जन्म इन आँखों से नहीं देखा जा सकता। मैं अजन्मा, अव्यक्त, शाश्वत होते हुए भी शरीर के आधारवाला हूँ। अवधू जीवत में कर आसा। मुए मुक्ति गुरु कहे स्वार्थी, झूठा दे विश्वासा।। शरीर के रहते ही उस परमतत्त्व में प्रवेश पाया जाता है। लेशमात्र भी कमी है, जन्म लेना पड़ता है। अभी तक अर्जुन श्रीकृष्ण को अपने समान देहधारी समझता है। वह अन्तरंग प्रश्न रखता है- क्या आपका जन्म वैसा ही है, जैसा सबका है? क्या आप भी शरीरों की तरह पैदा होते हैं? श्रीकृष्ण कहते हैं- अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥६॥