यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context१०२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता कर्म को देखता है और मेरा साक्षात् करके वह पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होता, बल्कि मुझे प्राप्त होता है। जब तत्त्वदर्शी ही भगवान का जन्म और कार्य देख पाता है तो लोग लाखों की संख्या में भीड़ लगाये क्यों खड़े हैं कि कहीं अवतार होगा तो दर्शन करेंगे? क्या आप तत्त्वदर्शी हैं? महात्मा-वेष में आज भी विविध तरीकों से, मुख्यतः महात्मा-वेष की आड़ में बहुत से लोग प्रचार करते फिरते हैं कि वे अवतार हैं या उनके दलाल प्रचार कर देते हैं। लोग भेड़ की तरह अवतार को देखने टूट पड़ते हैं; किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं कि केवल तत्त्वदर्शी ही देख पाता है। अब तत्त्वदर्शी किसे कहते हैं? अध्याय २ में सत्-असत् का निर्णय देते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया- अर्जुन ! असत् वस्तु का अस्तित्व नहीं है और सत् का तीनों कालों में कभी अभाव नहीं है। तो क्या आप ऐसा कहते हैं? उन्होंने बताया- “नहीं, तत्त्वदर्शियों ने इसे देखा।” न किसी भाषाविद् ने देखा, न किसी समृद्धिशाली ने देखा। यहाँ पुनः बल देते हैं कि मेरा आविर्भाव तो होता है लेकिन उसे तत्त्वदर्शी ही देख पाता है। तत्त्वदर्शी एक प्रश्न है। ऐसा कुछ नहीं कि पाँच तत्त्व हैं, पचीस तत्त्व हैं- इनकी गणना सीख ली और हो गये तत्त्वदर्शी। श्रीकृष्ण ने आगे बताया कि आत्मा ही परमतत्त्व है। आत्मा परम से संयुक्त होकर परमात्मा हो जाता है। आत्मसाक्षात्कार करनेवाला ही इस आविर्भाव को समझ पाता है। सिद्ध है कि अवतार किसी विरही अनुरागी के हृदय में होता है। आरम्भ में उसे वह समझ नहीं पाता कि हमें कौन संकेत देता है? कौन मार्गदर्शन करता है? किन्तु परमतत्त्व परमात्मा के दर्शन के साथ ही वह देख पाता है, समझ पाता है और फिर शरीर को त्यागकर पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता। श्रीकृष्ण ने कहा कि मेरा जन्म दिव्य है, इसे देखनेवाला मुझे प्राप्त होता है, तो लोगों ने उनकी मूर्ति बना ली, पूजा करने लगे। आकाश में कहीं उनके निवास की कल्पना कर ली। ऐसा कुछ नहीं है। उन महापुरुष का आशय केवल इतना है कि यदि आप निर्धारित कर्म करें तो पायेंगे कि आप भी दिव्य