यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context१०८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता अकर्म क्या है? इस विषय में बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हैं, उसे भली प्रकार समझ लेना चाहिये। किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।१६।। कर्म क्या है और अकर्म क्या है?- इस विषय में बुद्धिमान् पुरुष भी मोहित हैं। इसलिये मैं वह कर्म तेरे लिये अच्छी तरह से कहूँगा, जिसे जानकर तू ‘अशुभात् मोक्ष्यसे’- अशुभ अर्थात् संसार-बन्धन से भली प्रकार छूट जायेगा। कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जो संसार-बन्धन से मुक्ति दिलाती है। इसी कर्म को जानने के लिये श्रीकृष्ण पुनः बल देते हैं- कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।।१७।। कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिये, अकर्म का स्वरूप भी समझना चाहिये और विकर्म अर्थात् विकल्पशून्य विशेष कर्म जो आप्तपुरुषों द्वारा होता है, उसे भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्म की गति गहन है। कतिपय लोगों ने विकर्म का अर्थ ‘निषिद्ध कर्म’, ‘मन लगाकर किया गया कर्म’ इत्यादि किया है। वस्तुतः यहाँ ‘वि’ उपसर्ग विशिष्टता का द्योतक है। प्राप्ति के पश्चात् महापुरुषों के कर्म विकल्पशून्य होते हैं। आत्मस्थित, आत्मतृप्त, आप्तकाम महापुरुषों को न तो कर्म करने से कोई लाभ है और न छोड़ने से कोई हानि ही है, फिर भी वे पीछेवालों के हित के लिये कर्म करते हैं। ऐसा कर्म विकल्पशून्य है, विशुद्ध है और यही कर्म विकर्म कहलाता है। उदाहरणार्थ गीता में जहाँ भी किसी कार्य में ‘वि’ उपसर्ग लगा है, उसकी विशेषता का द्योतक है, निकृष्टता का नहीं। यथा ‘योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः।’ (गीता ५/७)- जो योग से युक्त है वह विशेष रूप से शुद्ध आत्मावाला, विशेष रूप से जीते अन्तःकरणवाला इत्यादि विशेषता के ही द्योतक हैं। इसी प्रकार गीता में स्थान-स्थान पर ‘वि’ का प्रयोग हुआ है, जो विशेष पूर्णता का द्योतक है। इसी प्रकार ‘विकर्म’ भी विशिष्ट कर्म का