यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context११० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता पथ पर अग्रसर होता है, अपने को अकर्त्ता समझकर धारावाहिक कर्म करता है वही बुद्धिमान् है, उसकी जानकारी यथार्थ है, वही योगी है। श्रीकृष्ण के अनुसार जो कुछ किया जाता है, कर्म नहीं है। कर्म एक निर्धारित की हुई क्रिया है। ‘नियतं कुरु कर्म त्वम्’- अर्जुन! तू निर्धारित कर्म को कर। निर्धारित कर्म है क्या? तब बताया, ‘यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।’- यज्ञ को कार्यरूप देना ही कर्म है। तो इसके अतिरिक्त जो कुछ किया जाता है, क्या वह कर्म नहीं है? श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘अन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः’- इस यज्ञ को कार्यरूप देने के सिवाय जो कुछ किया जाता है, वह इसी लोक का बन्धन है, न कि कर्म। ‘तदर्थं कर्म’- अर्जुन! उस यज्ञ की पूर्ति के लिये भली प्रकार आचरण कर। और जब यज्ञ का स्वरूप बताया तो वह शुद्ध रूप से आराधना की एक विधि-विशेष है, जो उस आराध्य देव तक पहुँचाकर उसमें विलय दिलाता है। इस यज्ञ में इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, दैवी सम्पद् का अर्जन इत्यादि बताते हुए अन्त में कहा- बहुत से योगी प्राण और अपान की गति का निरोध करके प्राणायाम के परायण हो जाते हैं। जहाँ न भीतर से संकल्प उठता है और न बाह्य वातावरण का संकल्प मन के अन्दर प्रविष्ट हो पाता है, ऐसी स्थिति में चित्त का सर्वथा निरोध और निरुद्ध चित्त के भी विलयकाल में वह पुरुष ‘यान्ति ब्रह्म सनातनम्’- शाश्वत, सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है। यही सब यज्ञ है, जिसे कार्यरूप देने का नाम कर्म है। अतः कर्म का शुद्ध अर्थ है ‘आराधना’, कर्म का अर्थ है ‘भजन’, कर्म का अर्थ है ‘योग-साधना’ को भली प्रकार सम्पादित करना- जिसका विशद वर्णन इसी अध्याय में आगे आ रहा है। यहाँ कर्म और अकर्म का केवल विभाजन किया गया, जिससे कर्म करते समय उसे सही दिशा दी जा सके और उस पर चला जा सके। जिज्ञासा स्वाभाविक है कि कर्म करते ही रहेंगे या कभी कर्मों से छुटकारा भी मिलेगा? इस पर योगेश्वर कहते हैं- यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः। ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।।१९।।