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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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११६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता था, उसी में स्थिति आ गयी तो शेष क्या रहा? पुनः योगेश्वर श्रीकृष्ण यज्ञ को भली प्रकार समझाते हैं- द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे। स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः।।२८।। अनेक लोग द्रव्ययज्ञ करते हैं अर्थात् आत्मपथ में, महापुरुषों की सेवा में पत्र-पुष्प अर्पित करते हैं। वे समर्पण के साथ महापुरुषों की सेवा में द्रव्य लगाते हैं। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं- भक्तिभाव से पत्र, पुष्प, फल, जल जो कुछ भी मुझे देता है, उसे मैं खाता हूँ और उसका परमकल्याण-सृजन करनेवाला होता हूँ। यह भी यज्ञ है। हर आत्मा की सेवा करना, भूले हुए को आत्मपथ पर लाना द्रव्ययज्ञ है; क्योंकि प्राकृतिक संस्कारों को जलाने में समर्थ है। इसी प्रकार कई पुरुष ‘तपोयज्ञाः’- स्वधर्म पालन में इन्द्रियों को तपाते हैं अर्थात् स्वभाव से उत्पन्न क्षमता के अनुसार यज्ञ की निम्न और उन्नत अवस्थाओं के बीच तपते हैं। इसी पथ की अल्पज्ञता में पहली श्रेणी का साधक शूद्र परिचर्या द्वारा, वैश्य दैवी सम्पद् के संग्रह द्वारा, क्षत्रिय काम- क्रोधादि के उन्मूलन द्वारा और ब्राह्मण ब्रह्म में प्रवेश की योग्यता के स्तर से इन्द्रियों को तपाता है। सबको एक-जैसा परिश्रम करना पड़ता है। वास्तव में यज्ञ एक ही है। अवस्था के अनुसार ऊँची-नीची श्रेणियाँ गुजरती जाती हैं। ‘पूज्य महाराज जी’ कहते थे- “मनसहित इन्द्रियों और शरीर को लक्ष्य के अनुरूप तपाना ही तप कहलाता है। ये लक्ष्य से दूर भागेंगे, इन्हें समेटकर उधर ही लगाओ।” अनेक पुरुष योगयज्ञ का आचरण करते हैं। प्रकृति में भटकती हुई आत्मा का प्रकृति से परे परमात्मा से मिलन का नाम ‘योग’ है। योग की परिभाषा अध्याय ६/२३ में द्रष्टव्य है। सामान्यतः दो वस्तुओं का मिलन योग कहलाता है। कागज से कलम मिल गया, थाली और मेज मिल गये तो क्या योग हो गया? नहीं, ये तो पंचभूतों से निर्मित पदार्थ हैं। एक ही हैं, दो कहाँ? दो प्रकृति और पुरुष हैं। प्रकृति में स्थित आत्मा अपने ही शाश्वत रूप परमात्मा में प्रवेश पा जाता है तो प्रकृति पुरुष में विलीन हो जाती है। यही योग

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