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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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चतुर्थ अध्याय १२७ पर नष्ट होने की स्थिति में जा पहुँचता है; किन्तु जो प्रिय भक्त है, अनन्य सखा है उसे महापुरुष ही सँभाल लेते हैं। अर्जुन के प्रश्न करने पर कि आपका जन्म तो अब हुआ है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया- अव्यक्त, अविनाशी, अजन्मा और सम्पूर्ण भूतों में प्रवाहित होने पर भी आत्ममाया, योग-प्रक्रिया द्वारा अपनी त्रिगुणमयी प्रकृति को वश में करके मैं प्रकट होता हूँ। प्रकट होकर करते क्या हैं? साध्य वस्तुओं को परित्राण देने तथा जिनसे दूषित उत्पन्न होते हैं उनका विनाश करने के लिये, परमधर्म परमात्मा को स्थिर करने के लिये मैं आरम्भ से पूर्तिपर्यन्त पैदा होता हूँ। मेरा वह जन्म और कर्म दिव्य है। उसे केवल तत्त्वदर्शी ही जान पाते हैं। भगवान का आविर्भाव तो कलियुग की अवस्था से ही हो जाता है, यदि सच्ची लगन हो; किन्तु आरम्भिक साधक समझ ही नहीं पाता कि यह भगवान बोल रहे हैं या योंही संकेत मिल रहे हैं। आकाश से कौन बोलता है? ‘महाराज जी’ बताते थे कि जब भगवान कृपा करते हैं, आत्मा से रथी हो जाते हैं तो खम्भे से, वृक्ष से, पत्ते से, शून्य से हर स्थान से बोलते और सँभालते हैं। उत्थान होते-होते जब परमतत्त्व परमात्मा विदित हो जाय, तभी स्पर्श के साथ ही वह स्पष्ट समझ पाता है। इसलिये अर्जुन! मेरे उस स्वरूप को तत्त्वदर्शियों ने देखा और मुझे जानकर वे तत्क्षण मुझमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं, जहाँ से पुनः आवागमन में नहीं आते। इस प्रकार उन्होंने भगवान के आविर्भाव की विधि को बताया कि वह किसी अनुरागी के हृदय में होता है, बाहर कदापि नहीं। श्रीकृष्ण ने बताया- मुझे कर्म नहीं बाँधते और इस स्तर से जो जानता है, उसे भी कर्म नहीं बाँधते। यही समझकर मुमुक्षु पुरुषों ने कर्म का आरम्भ किया था कि उस स्तर से जानेंगे तो जैसे श्रीकृष्ण वैसा ही उस स्तर से जाननेवाला वह पुरुष, और जान लेने पर वैसा ही वह मुमुक्षु अर्जुन। यह उपलब्धि निश्चित है, यदि यज्ञ किया जाय। यज्ञ का स्वरूप बताया। यज्ञ का परिणाम परमतत्त्व, परमशान्ति बताया। इस ज्ञान को पाया कहाँ जाय? इस पर किसी तत्त्वदर्शी के पास जाने और उन्हीं विधियों से पेश आने को कहा, जिससे वे महापुरुष अनुकूल हो जायँ।