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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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पञ्चम अध्याय १३३ सुख की कामना से वह किसका दर्शन, स्पर्श इत्यादि करेगा? यदि कोई श्रेष्ठ वस्तु आगे होती तो आसक्ति अवश्य रहती। किन्तु प्राप्ति के बाद अब और आगे जायेगा कहाँ और पीछे त्यागेगा क्या? इसलिये योगयुक्त पुरुष लिप्त नहीं होता। इसी को एक उदाहरण के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं- ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा।।१०।। कमल कीचड़ में होता है। उसका पत्ता पानी के ऊपर तैरता है। लहरें रात-दिन उसके ऊपर से गुजरती हैं; किन्तु आप पत्ते को देखें, सूखा मिलेगा। जल की एक बूँद भी उस पर टिक नहीं पाती। कीचड़ और जल में रहते हुए भी वह उनसे लिप्त नहीं होता। ठीक इसी प्रकार, जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में विलय करके (साक्षात्कार के साथ ही कर्मों का विलय होता है, इससे पूर्व नहीं), आसक्ति को त्याग करके (अब आगे कोई वस्तु नहीं अतः आसक्ति नहीं रहती, इसलिये आसक्ति त्यागकर) कर्म करता है, वह भी इसी प्रकार लिप्त नहीं होता। फिर वह करता क्यों है? आपलोगों के लिये, समाज के कल्याण- साधन के लिये, पीछेवालों के मार्गदर्शन के लिये। इसी पर बल देते हैं- कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि। योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ।।११।। योगीजन केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति त्यागकर आत्मशुद्धि के लिए कर्म करते हैं। जब कर्म ब्रह्म में विलीन हो चुके तो क्या अब भी आत्मा अशुद्ध ही है? नहीं, वे 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' हो चुके हैं। सम्पूर्ण प्राणियों में वे अपनी ही आत्मा का प्रसार पाते हैं। उन समस्त आत्माओं की शुद्धि के लिये, आप सबका मार्गदर्शन करने के लिये वे कर्म में बरतते हैं। शरीर, मन, बुद्धि तथा केवल इन्द्रियों से वह कर्म करता है, स्वरूप से वह कुछ भी नहीं करता, स्थिर है। बाहर से वह सक्रिय दिखायी देता है; किन्तु भीतर उसमें असीम शान्ति है। रस्सी जल चुकी, मात्र ऐंठन (आकार) शेष है, जिससे बँध नहीं सकता। युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्। अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ।।१२।।