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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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पञ्चम अध्याय १३५ कुछ नहीं करता। इसी पर अगला श्लोक देखें- न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥१४॥ वह प्रभु न तो भूतप्राणियों के कर्त्तापन को, न कर्मों को और न कर्मफलों का संयोग ही बैठाता है, बल्कि स्वभाव में स्थित प्रकृति के दबाव के अनुसार ही सभी बरतते हैं। जैसी जिसकी प्रकृति- सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी है, उसी स्तर से वह बरतता है। प्रकृति तो लम्बी-चौड़ी है, लेकिन आपके ऊपर उतना ही प्रभाव डाल पाती है जितना आपका स्वभाव विकृत अथवा विकसित है। प्रायः लोग कहते हैं कि करने-करानेवाले तो भगवान हैं, हम तो यन्त्रमात्र हैं। हमसे वे भला करावें अथवा बुरा। किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि न वह प्रभु स्वयं करता है, न कराता है और न वह जुगाड़ ही बैठाता है। लोग अपने स्वभाव में स्थित प्रकृति के अनुरूप बरतते हैं। स्वतः कार्य करते हैं। वे अपने आदत से मजबूर होकर करते हैं, भगवान नहीं करते। तब लोग कहते क्यों हैं कि भगवान करते हैं? इस पर योगेश्वर बताते हैं- नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥१५॥ जिसे अभी प्रभु कहा, उसी को यहाँ विभु कहा गया है; क्योंकि वह सम्पूर्ण वैभव से संयुक्त है। प्रभुता एवं वैभव से संयुक्त वह परमात्मा न किसी के पापकर्म को और न किसी के पुण्यकर्मों को ही ग्रहण करता है; फिर भी लोग कहते क्यों हैं? इसलिये कि अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है। उन्हें अभी साक्षात्कारसहित ज्ञान तो हुआ नहीं, वे अभी जन्तु हैं। मोहवश वे कुछ भी कह सकते हैं। ज्ञान से क्या होता है? इसे स्पष्ट करते हैं- ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥१६॥ जिसके अन्तःकरण का वह अज्ञान (जिसने ज्ञान को ढँक रखा था) आत्मसाक्षात्कार द्वारा नष्ट हो गया है और इस प्रकार जिसने ज्ञान प्राप्त कर