यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextअष्टम अध्याय १८९ भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥१९॥ हे पार्थ! सब प्राणी इस प्रकार जागृत होकर प्रकृति से विवश होकर अविद्यारूपी रात्रि के आने पर अचेत हो जाते हैं। वे नहीं देख पाते कि उनका लक्ष्य क्या है? दिन के प्रवेशकाल में वे पुनः जागृत हो जाते हैं। जब तक बुद्धि है, तब तक इसके अन्तराल में विद्या और अविद्या का क्रम चलता रहता है। तब तक वह साधक ही है, महापुरुष नहीं। परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः। यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥२०॥ एक तो ब्रह्मा अर्थात् बुद्धि अव्यक्त है, इन्द्रियों से दिखायी नहीं पड़ती और इससे भी परे सनातन अव्यक्त भाव है, जो भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता अर्थात् विद्या में सचेत और अविद्या में अचेत, दिन में उत्पन्न और रात्रि में विलीन भावोंवाले अव्यक्त ब्रह्मा के भी मिट जाने पर वह सनातन अव्यक्त भाव मिलता है, जो नष्ट नहीं होता। बुद्धि में होनेवाले उक्त दोनों उतार-चढ़ाव जब मिट जाते हैं तब सनातन अव्यक्त भाव मिलता है, जो मेरा परमधाम है। जब सनातन अव्यक्त भाव प्राप्त हो गया तो बुद्धि भी उसी भाव में रंग जाती है, उसी भाव को धारण कर लेती है। इसलिये वह बुद्धि स्वयं तो मिट जाती है और उसके स्थान पर सनातन अव्यक्त भाव ही शेष बचता है। अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥२१॥ उस सनातन अव्यक्त भाव को अक्षर अर्थात् अविनाशी कहा जाता है। उसी को परमगति कहते हैं। वही मेरा परमधाम है, जिसे प्राप्त होकर मनुष्य पीछे नहीं आते, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इस सनातन अव्यक्त भाव की प्राप्ति का विधान बताते हैं- पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया। यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥२२॥ पार्थ! जिस परमात्मा के अन्तर्गत सम्पूर्ण भूत हैं, जिससे सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, सनातन अव्यक्त भाववाला वह परमपुरुष अनन्य भक्ति से प्राप्त