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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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१९४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता इस योग में प्रविष्ट पुरुष की दो गतियाँ हैं। जो पूर्ण प्रकाश को प्राप्त षडैश्वर्यसम्पन्न ऊर्ध्वरेता है, जिसमें लेशमात्र भी कमी नहीं है, वह परमगति को प्राप्त होता है। यदि उस योगकर्त्ता में लेशमात्र भी कमी है, कृष्णपक्ष-सी कालिमा का संचार है, ऐसी अवस्था में शरीर का समय समाप्त होनेवाले योगी को जन्म लेना पड़ता है। वह सामान्य जीव की तरह जन्म-मरण के चक्कर में नहीं फँसता बल्कि जन्म लेकर उससे आगे की शेष साधना को पूरा करता है। इस प्रकार आगे के जन्म में उसी क्रिया से चलकर वह भी वहीं पहुँच जाता है जिसका नाम परमधाम है। पहले भी श्रीकृष्ण कह आये हैं कि इसका थोड़ा भी साधन जन्म-मरण के महान् भय से उद्धार कराके ही छोड़ता है। 'दोनों रास्ते शाश्वत हैं, अमिट हैं'- इस बात को समझकर कोई भी पुरुष योग से चलायमान नहीं होता। अर्जुन ! तू योगी बन। योगी वेद, तप, यज्ञ और दान के भी पुण्यफलों का उल्लंघन कर जाता है, परमगति को प्राप्त होता है। इस अध्याय में स्थान-स्थान पर परमगति का चित्रण किया गया है जिसे अव्यक्त, अक्षय और अक्षर कहकर सम्बोधित किया गया, जिसका कभी क्षय अथवा विनाश नहीं होता। अतः- ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे 'अक्षरब्रह्मयोगो' नामाष्टमोऽध्यायः॥८॥ इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में 'अक्षर-ब्रह्मयोग' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण होता है। इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः 'यथार्थगीता' भाष्ये 'अक्षरब्रह्मयोगो' नामाष्टमोऽध्यायः॥८॥ इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत 'श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य 'यथार्थ गीता' में 'अक्षर-ब्रह्मयोग' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण होता है। ।। हरिः ॐ तत्सत् ।।