BharatKosha
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

Page 260 of 429

Read in context
Page 260

दशम अध्याय २२५ हूँ। जलचरों में उनका अधिपति 'वरुण' हूँ तथा पितरों में 'अर्यमा' हूँ। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह पाँच यम हैं। इनके पालन में आनेवाले विकारों को काटना 'अरः' है। विकारों के शमन से पितृ अर्थात् भूत-संस्कार तृप्त होते हैं, निवृत्ति प्रदान कर देते हैं। शासन करनेवालों में मैं यमराज हूँ अर्थात् उपर्युक्त यमों का नियामक हूँ। प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्। मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्।।३०।। मैं दैत्यों में प्रह्लाद हूँ। (पर + आह्लाद-पर के लिये आह्लाद) प्रेम ही प्रह्लाद है। आसुरी सम्पद् में रहते हुए ईश्वर के लिए आकर्षण-विकलता आरम्भ होती है, जिससे परमप्रभु का दिग्दर्शन होता है, ऐसा प्रेमोल्लास मैं हूँ। गिनती करनेवालों में मैं समय हूँ। एक, दो, तीन, चार ऐसी गिनती या क्षण, घड़ी, दिन, पक्ष, मास इत्यादि नहीं, बल्कि ईश्वर के चिन्तन में लगा हुआ समय मैं हूँ। यहाँ तक कि 'जागत में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय।' अनवरत चिन्तन में समय मैं हूँ। पशुओं में मृगराज [योगी भी मृ (जंगल) + ग (गमन करना) अर्थात् योगरूपी जंगल में गमन करनेवाला है] तथा पक्षियों में गरुड़ मैं हूँ। ज्ञान ही गरुड़ है। जब ईश्वरीय अनुभूति आने लगती है, तब यही मन अपने आराध्य की सवारी बन जाता है और जब यही मन संशय से युक्त है तब सर्प होता है, डसता रहता है, योनियों में फेंकता है। गरुड़ विष्णु की सवारी है। जो सत्ता विश्व में अणुरूप से संचारित है, ज्ञानसंयुक्त मन उसे अपने में धारण करता है, उसका वाहक बनता है। श्रीकृष्ण कहते हैं, इष्ट को धारण करनेवाला मन मैं हूँ। पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्। झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी।।३१।। पवित्र करनेवालों में मैं वायु हूँ, शस्त्रधारियों में राम हूँ। 'रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।' योगी किसमें रमण करते हैं? अनुभव में। ईश्वर इष्टरूप में जो निर्देशन देता है, योगी उसमें रमण करते हैं। उस जागृति का नाम राम है और वह जागृति मैं हूँ। मछलियों में मगर तथा नदियों में गंगा मैं हूँ।