यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextएकादश अध्याय २३५ इस प्रकार तीनों श्लोकों तक भगवान लगातार दिखाते चले गये; किन्तु अर्जुन को कुछ दिखायी नहीं पड़ा (वह आँखें मलता रह गया)। अतः ऐसा दिखाते हुए भगवान सहसा रुक जाते हैं और कहते हैं- न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्।।८।। अर्जुन! तू मुझे अपने नेत्रों द्वारा अर्थात् बौद्धिक दृष्टि द्वारा देखने में समर्थ नहीं है इसलिये मैं तुझे दिव्य अर्थात् अलौकिक दृष्टि देता हूँ, जिससे तू मेरे प्रभाव और योगशक्ति को देख। इधर योगेश्वर श्रीकृष्ण के कृपा-प्रसाद से अर्जुन को वही दृष्टि प्राप्त हुई, उसने देखा और उधर योगेश्वर व्यास के कृपा-प्रसाद से वही दृष्टि संजय को मिली थी। जो कुछ अर्जुन ने देखा, अक्षरशः वही संजय ने भी देखा और उसके प्रभाव से अपने को कल्याण का भागी बनाया। स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण एक योगी के समकक्ष हैं। सञ्जय उवाच एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः। दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्।।९।। संजय बोला- हे राजन्! महायोगेश्वर हरि ने इस प्रकार कहकर उसके उपरान्त पार्थ को अपना परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्यस्वरूप दिखाया। जो स्वयं योगी हो और दूसरों को भी योग प्रदान करने की जिसमें क्षमता हो, जो योग का स्वामी हो, उसे योगेश्वर कहते हैं। इसी प्रकार सर्वस्व का हरण करनेवाला हरि है। यदि केवल दुःखों का हरण किया और सुख छोड़ दिया तो दुःख आयेगा। अतः सब पापों के नाश के साथ सर्वस्व का हरण करके अपना स्वरूप देने में जो सक्षम है, वह हरि है। उन्होंने पार्थ को अपना दिव्य स्वरूप दिखाया। सामने तो खड़े ही थे। अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्।।१०।। अनेक मुख और नेत्रों से युक्त, अनेक अद्भुत दर्शनोंवाले, अनेक दिव्य भूषणों से युक्त और अनेक दिव्य शस्त्रों को हाथों में उठाये हुए तथा-