यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextएकादश अध्याय २३७ हे देव! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर बैठे हुए ब्रह्मा को, महादेव को, सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ। यह प्रत्यक्ष दर्शन था, कोरी कल्पना नहीं; किन्तु ऐसा तभी सम्भव है जब योगेश्वर, पूर्णत्व प्राप्त महापुरुष हृदय से दृष्टि प्रदान करें। यह साधनगम्य है। अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्। नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥१६॥ विश्व के स्वामी ! मैं आपको अनेक हाथ, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपोंवाला देखता हूँ। हे विश्वरूप ! न मैं आपके आदि को, न मध्य को और न अन्त को ही देखता हूँ अर्थात् आपके आदि, मध्य और अन्त का निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ। किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्। पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता- द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥१७॥ मैं आपको मुकुटयुक्त, गदायुक्त, चक्रयुक्त, सब ओर से प्रकाशमान तेजपुंज स्वरूप, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश देखने में दुष्कर अर्थात् कठिनाई से देखा जानेवाला और सब ओर से बुद्धि आदि से ग्रहण न हो सकनेवाला अप्रमेय देखता हूँ। इस प्रकार सम्पूर्ण इन्द्रियों से पूर्णतया समर्पित होकर योगेश्वर श्रीकृष्ण को इस रूप में देखकर अर्जुन उनकी स्तुति करने लगा- त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥१८॥