यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context२४० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता पूर्ण हैं, अधिकतम सीमा में हैं। अर्जुन उसी की प्रवेशिका में है, मार्ग में है। मंजिल मार्ग का दूसरा छोर ही तो है।) योगेश्वर! आपके बहुत मुख और नेत्रोंवाले; बहुत हाथ, जंघा और पैरोंवाले; बहुत उदरोंवाले, अनेक विकराल दाढ़ोंवाले महान् रूप को देखकर सब लोक व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ। अब अर्जुन को कुछ भय हो रहा है कि श्रीकृष्ण इतने महान् हैं। नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्। दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।।२४।। विश्व में सर्वत्र अणुरूप से व्याप्त हे विष्णो! आकाश को स्पर्श किये हुए, प्रकाशमान, अनेक रूपों से युक्त, फैलाये हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर विशेष रूप से भयभीत अन्तःकरणवाला मैं धैर्य और मन के समाधानरूपी शान्ति को नहीं पा रहा हूँ। दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि। दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास।।२५।। आपके विकराल दाढ़ोंवाले और कालाग्नि (काल के लिये भी अग्नि है परमात्मा) के समान प्रज्वलित मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जान पा रहा हूँ। चारों ओर प्रकाश देखकर दिशाभ्रम हो रहा है। आपका यह रूप देखते हुए मुझे सुख भी नहीं मिल रहा है। हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों। अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः। भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः।।२६।।