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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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एकादश अध्याय २५३ कराया भी; किन्तु अर्जुन ने जब देखा तो क्या पाया? 'मानुषं रूपं'– मनुष्य के रूप को देखा। वस्तुतः प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष ही चतुर्भुज और अनन्तभुज कहलाते हैं। दो भुजावाला महापुरुष तो अनुरागी के समक्ष बैठा ही है; किन्तु अन्यत्र कहीं से कोई स्मरण करता है तो वही महापुरुष उस स्मरणकर्त्ता से जागृत (रथी) होकर उसका भी मार्गदर्शन करता है। 'भुजा' कार्य का प्रतीक है। वे भीतर भी कार्य करते हैं और बाहर भी, यही चतुर्भुज स्वरूप है। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म क्रमशः वास्तविक लक्ष्यघोष, साधन-चक्र का प्रवर्तन, इन्द्रियों का दमन और निर्मल-निर्लेप कार्यक्षमता का प्रतीक मात्र है। यही कारण है कि चतुर्भुज रूप में उन्हें देखने पर भी अर्जुन ने उन्हें मनुष्य रूप में ही पाया। चतुर्भुज महापुरुषों के शरीर और स्वरूप से कार्य करने की विधि-विशेष का नाम है, न कि चार हाथवाले कोई श्रीकृष्ण थे। श्रीभगवानुवाच सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम। देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः।।५२।। महात्मा श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! मेरा यह रूप देखने को अतिदुर्लभ है, जैसा कि तूने देखा है; क्योंकि देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की इच्छा रखते हैं। वस्तुतः सभी लोग सन्त को पहचान ही नहीं पाते। 'पूज्य सत्संगी महाराज' अन्तःप्रेरणावाले पूर्ण महापुरुष थे; लेकिन लोग उन्हें पागल समझते रहे। किसी-किसी पुण्यात्मा को आकाशवाणी हुई कि ये सद्गुरु हैं; केवल उन्होंने उन्हें हृदय से पकड़ा, उनके स्वरूप को पाया और अपनी गति पा ली। यही श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिनके हृदय में दैवी सम्पद् जागृत है, वे देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की आकांक्षा रखते हैं। तो क्या यज्ञ, दान अथवा वेदाध्ययन से आप देखे जा सकते हैं? वह महात्मा कहते हैं- नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा।।५३।।