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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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एकादश अध्याय २५७ जागृत होकर प्रेरक के रूप में कार्य करता है। हाथ उसके कार्य का प्रतीक है, यही चतुर्भुज है। श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! तेरे सिवाय मेरे इस रूप को न कोई देख सका है और न भविष्य में कोई देख सकेगा। तब गीता तो हमारे लिये व्यर्थ है। किन्तु नहीं, योगेश्वर कहते हैं- एक उपाय है। जो मेरा अनन्य भक्त है, मेरे सिवाय जो दूसरे किसी का स्मरण न करके निरन्तर मेरा ही चिन्तन करनेवाला है, उसकी अनन्य भक्ति के द्वारा मैं प्रत्यक्ष देखने को (जैसा तूने देखा है), तत्त्व से जानने को और प्रवेश करने को भी सुलभ हूँ। अर्थात् अर्जुन अनन्य भक्त था। भक्ति का परिमार्जित रूप है अनुराग, इष्ट के अनुरूप लगाव। 'मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा।' (रामचरितमानस, ७/६१/१)- अनुरागविहीन पुरुष न कभी पाया है और न पा सकेगा। अनुराग नहीं है तो कोई लाख योग करे, जप करे, तप करे या दान करे, 'वह' नहीं मिलता। अतः इष्ट के अनुरूप राग अथवा अनन्य भक्ति नितान्त आवश्यक है। अन्त में श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! मेरे द्वारा निर्दिष्ट कर्म को कर, मेरा अनन्य भक्त होकर कर, मेरी शरण होकर कर; किन्तु संगदोष से अलग रहकर। संगदोष में यह कर्म हो ही नहीं सकता। अतः संगदोष इस कर्म के सम्पादित होने में बाधक है। जो बैरभाव से रहित है, वही मुझे प्राप्त करता है। जब संगदोष नहीं है, जहाँ हमें छोड़कर दूसरा कोई है ही नहीं, बैर का मानसिक संकल्प भी नहीं है तो युद्ध कैसा? बाहर दुनिया में लड़ाई-झगड़े होते रहते हैं; किन्तु विजय जीतनेवालों को भी नहीं मिलती। दुर्जय संसाररूपी शत्रु को असंगतारूपी शस्त्र से काटकर परम में प्रवेश पा जाना ही वास्तविक विजय है, जिसके पीछे हार नहीं है। इस अध्याय में पहले तो योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दृष्टि प्रदान की, फिर अपने विश्वरूप का दर्शन कराया। अतः- ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे 'विश्वरूपदर्शनयोगो' नामैकादशोऽध्यायः।।११।।