यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextद्वादश अध्याय २६१ अर्जुन ! मुझमें मन को एकाग्र करके निरन्तर मुझसे संयुक्त हुए जो भक्तजन परम से सम्बन्ध रखनेवाली श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझे भजते हैं, वे मुझे योगियों में भी अति उत्तम योगी मान्य हैं। ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्।।३।। संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः। ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः।।४।। जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार संयत करके मन-बुद्धि के चिन्तन से अत्यन्त परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप, सदा एकरस रहनेवाले, नित्य, अचल, अव्यक्त, आकाररहित और अविनाशी ब्रह्म की उपासना करते हैं, सम्पूर्ण भूतों के हित में लगे हुए और सबमें समान भाववाले वे योगी भी मुझे ही प्राप्त होते हैं। ब्रह्म के उपर्युक्त विशेषण मुझसे भिन्न नहीं हैं। किन्तु- क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्। अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते।।५।। उन अव्यक्त परमात्मा में आसक्त हुए चित्तवाले पुरुषों के साधन में क्लेश विशेष है; क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्त विषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है। जब तक देह का भान है, तब तक अव्यक्त की प्राप्ति दुष्कर है। योगेश्वर श्रीकृष्ण सद्गुरु थे। अव्यक्त परमात्मा उनमें व्यक्त था। वे कहते हैं कि महापुरुष की शरण न लेकर जो साधक अपनी शक्ति समझते हुए आगे बढ़ता है कि- मैं इस अवस्था में हूँ, आगे इस अवस्था में जाऊँगा, मैं अपने ही अव्यक्त स्वरूप को प्राप्त होऊँगा, वह मेरा ही रूप होगा, मैं वही हूँ। इस प्रकार सोचते, प्राप्ति की प्रतीक्षा न करके अपने शरीर को ही 'सोऽहं' कहने लगता है। यही इस मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। वह 'दुःखालयम् अशाश्वतम्' में ही घूम-फिरकर खड़ा हो जाता है। किन्तु जो मेरी शरण लेकर चलता है वह-