यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextद्वादश अध्याय २६३ हुआ तू मेरी प्राप्तिरूपी सिद्धि को ही प्राप्त होगा। अर्थात् अभ्यास भी पार न लगे तो साधना-पथ में लगे भर रहो। अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः। सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ।।११।। यदि इसे भी करने में असमर्थ है तो सम्पूर्ण कर्मों के फल का त्याग कर अर्थात् लाभ-हानि की चिन्ता छोड़कर 'मद्योग' के आश्रित होकर अर्थात् समर्पण के साथ आत्मवान् महापुरुष की शरण में जा। उनसे प्रेरित होकर कर्म स्वतः होने लगेगा। समर्पण के साथ कर्मफल के त्याग का महत्त्व बताते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते। ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ।।१२।। केवल चित्त को रोकने के अभ्यास से ज्ञानमार्ग से कर्म में प्रवृत्त होना श्रेष्ठ है। ज्ञान-माध्यम से कर्म को कार्यरूप देने की अपेक्षा ध्यान श्रेष्ठ है; क्योंकि ध्यान में इष्ट रहता ही है। ध्यान से भी सम्पूर्ण कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है; क्योंकि इष्ट के प्रति समर्पण के साथ ही योग पर दृष्टि रखते हुए कर्मफल का त्याग करने से उसके योगक्षेम की जिम्मेदारी इष्ट की हो जाती है। इसलिये इस त्याग से वह तत्काल ही परमशान्ति को प्राप्त हो जाता है। अभी तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि अव्यक्त की उपासना करनेवाले ज्ञानमार्गी से समर्पण के साथ कर्म करनेवाला निष्काम कर्मयोगी श्रेष्ठ है। दोनों एक ही कर्म करते हैं; किन्तु ज्ञानमार्गी के पथ में व्यवधान अधिक हैं। उसके लाभ-हानि की जिम्मेदारी स्वयं पर रहती है, जबकि समर्पित भक्त की जिम्मेदारी महापुरुष पर होती है, इसलिये वह कर्मफल- त्याग द्वारा शीघ्र ही शान्ति को प्राप्त होता है। अब शान्तिप्राप्त पुरुष के लक्षण बताते हैं- अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ।।१३।।