यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextद्वादश अध्याय २६७ सम्पूर्ण कर्मफलों का त्याग कर। ऐसा त्याग करने से तू परमशान्ति को प्राप्त हो जायेगा। तत्पश्चात् परमशान्ति को प्राप्त हुए भक्त के लक्षण बताते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- जो सम्पूर्ण भूतों में द्वेषभाव से रहित है, जो करुणा से युक्त और दयालु है, ममता और अहंकार से रहित है, वह भक्त मुझे प्रिय है। जो ध्यान-योग में निरन्तर तत्पर और आत्मवान्, आत्मस्थित है, वह भक्त मुझे प्रिय है। जिससे न किसी को उद्वेग प्राप्त होता है और स्वयं भी जो किसी से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता, ऐसा भक्त मुझे प्रिय है। जो शुद्ध है, दक्ष है, व्यथाओं से उपराम है, सर्वारम्भों को त्यागकर जिसने पार पा लिया है, ऐसा भक्त मुझे प्रिय है। सम्पूर्ण कामनाओं का त्यागी और शुभाशुभों का पार पानेवाला भक्त मुझे प्रिय है। जो निन्दा और स्तुति में समान और मौन है, मनसहित जिसकी इन्द्रियाँ शान्त और मौन हैं, जो किसी भी प्रकार शरीर-निर्वाह में सन्तुष्ट और रहने के स्थान में ममता से रहित है, शरीर-रक्षा में भी जिसकी आसक्ति नहीं है, ऐसा स्थितप्रज्ञ भक्तिमान् पुरुष मुझे प्रिय है। इस प्रकार श्लोक ग्यारह से उन्नीस तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने शान्तिप्राप्त योगयुक्त भक्त की रहनी पर प्रकाश डाला, जो साधकों के लिये उपादेय है। अन्त में निर्णय देते हुए उन्होंने कहा- अर्जुन ! जो मेरे परायण हुए अनन्य श्रद्धा से युक्त पुरुष इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्कामभाव से भली प्रकार आचरण में ढालते हैं, वे भक्त मुझे अतिशय प्रिय हैं। अतः समर्पण के साथ इस कर्म में प्रवृत्त होना श्रेयतर है; क्योंकि उसके हानि-लाभ की जिम्मेदारी वह इष्ट सद्गुरु अपने ऊपर ले लेते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण ने स्वरूपस्थ महापुरुष के लक्षण बताये, उनकी शरण में जाने को कहा और अन्त में अपनी शरण में आने की प्रेरणा देकर उन महापुरुषों के समकक्ष अपने को घोषित किया। श्रीकृष्ण एक योगी, महात्मा थे। इस अध्याय में भक्ति को श्रेष्ठ बताया गया, अतः इस अध्याय का नामकरण 'भक्तियोग' युक्तिसंगत है।