यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextत्रयोदश अध्याय २७१ वही कहा गया है। अर्थात् वेदान्त, महर्षि, ब्रह्मसूत्र और हम एक ही बात कहने जा रहे हैं। श्रीकृष्ण वही कहते हैं, जो इन सबने कहा है। क्या शरीर (क्षेत्र) इतना ही है, जितना दिखायी देता है? इस पर कहते हैं- महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥५॥ अर्जुन ! पंच महाभूत (क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर), अहंकार, बुद्धि और चित्त (चित्त का नाम न लेकर उसे अव्यक्त परा प्रकृति कहा गया अर्थात् मूल प्रकृति पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें परा प्रकृति भी सम्मिलित है, उपर्युक्त आठों अष्टधा मूल प्रकृति है) तथा दस इन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, त्वचा, जिह्वा, वाक्, हाथ, पैर, उपस्थ तथा गुदा), एक मन और पाँच इन्द्रियों के विषय (रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श) तथा- इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः। एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥६॥ इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख और सबका समूह स्थूल देह का यह पिण्ड, चेतना और धैर्य- इस प्रकार यह क्षेत्र विकारोंसहित संक्षेप में कहा गया। संक्षेप में यही क्षेत्र का स्वरूप है, जिसमें बोया हुआ भला और बुरा बीज संस्कारों के रूप में उगता है। शरीर ही क्षेत्र है। शरीर में गारा-मसाला किस वस्तु का है? तो यही पाँच तत्त्व, दस इन्द्रियाँ, एक मन इत्यादि- जैसा लक्षण ऊपर गिनाया गया है। इन सबका सामूहिक संघात पिण्ड शरीर है। जब तक ये विकार रहेंगे, तब तक यह पिण्ड भी विद्यमान रहेगा, इसलिये कि यह विकारों से बना है। अब उस क्षेत्रज्ञ का स्वरूप देखें, जो इस क्षेत्र में लिप्त नहीं बल्कि इससे निवृत्त है- अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्। आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥७॥ हे अर्जुन! मान-अपमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, अहिंसा (अर्थात् अपनी तथा अन्य किसी की आत्मा को कष्ट न देना अहिंसा है।