यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextत्रयोदश अध्याय २७३ आत्मा के आधिपत्यवाले ज्ञान में एकरस स्थिति और तत्त्वज्ञान के अर्थस्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार- यह सब तो ज्ञान है और इससे जो विपरीत है, वह सब अज्ञान है- ऐसा कहा गया है। उस परमतत्त्व परमात्मा के साक्षात्कार के साथ मिलनेवाली जानकारी का नाम ज्ञान है। (अध्याय चार में उन्होंने कहा कि यज्ञ के पूर्तिकाल में यज्ञ जिसे शेष छोड़ता है, उस ज्ञानामृत का पान करनेवाला सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है। अतः ब्रह्म के साक्षात्कार के साथ मिलनेवाली जानकारी ज्ञान है। यहाँ भी वही कहते हैं कि तत्त्वस्वरूप परमात्मा के साक्षात्कार का नाम ज्ञान है।) इसके विपरीत सब अज्ञान है। अमानित्व इत्यादि उपर्युक्त लक्षण इस ज्ञान के पूरक हैं। यह प्रश्न पूरा हुआ। ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते। अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते।।१२।। अर्जुन! जो जानने योग्य है तथा जिसे जानकर मरणधर्मा मनुष्य अमृत- तत्त्व को प्राप्त होता है, उसे अच्छी प्रकार कहूँगा। वह आदिरहित परमब्रह्म न सत् कहा जाता है और न असत् ही कहा जाता है; क्योंकि जब तक वह अलग है, तब तक वह सत् है और जब मनुष्य उसमें समाहित हो गया तो कौन किससे कहे। एक ही रह जाता है, दूसरे का भान नहीं। ऐसी स्थिति में वह ब्रह्म न सत् है, न असत् है; बल्कि जो स्वयं सहज है, वही है। सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्। सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति।।१३।। वह ब्रह्म सब ओर से हाथ-पैरवाला, सब ओर से नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर से श्रोत्रवाला है-सुननेवाला है; क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च।।१४।। वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जाननेवाला है, फिर भी सब इन्द्रियों से रहित है। वह आसक्तिरहित, गुणों से अतीत होने पर भी सबको धारण और