यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextत्रयोदश अध्याय २७५ इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः। मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥१८॥ हे अर्जुन! बस इतना ही क्षेत्र, ज्ञान तथा जानने योग्य परमात्मा का स्वरूप संक्षेप में कहा गया है। इसे जानकर मेरा भक्त मेरे साक्षात् स्वरूप को प्राप्त होता है। अभी तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जिसे क्षेत्र कहा था, उसी को अब 'प्रकृति' और जिसे क्षेत्रज्ञ कहा था, उसी को अब 'पुरुष' शब्द से इंगित करते हैं- प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि। विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्॥१९॥ यह प्रकृति और पुरुष दोनों को ही तू अनादि जान तथा सम्पूर्ण विकार त्रिगुणमयी प्रकृति से ही उत्पन्न हुआ जान। कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते। पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥२०॥ कार्य और करण (जिनके द्वारा शुभ कार्य किये जाते हैं-विवेक, वैराग्य इत्यादि तथा अशुभ कार्य होने में काम, क्रोध इत्यादि करण हैं) को उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और यह पुरुष सुख-दुःखों को भोगने में कारण कहा जाता है। प्रश्न उठता है कि क्या वह भोगता ही रहेगा या इससे कभी छुटकारा भी मिलेगा? जब प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि हैं, तब कोई इनसे छूटेगा कैसे? इस पर कहते हैं- पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्। कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥२१॥ प्रकृति के बीच में खड़ा होनेवाला पुरुष ही प्रकृति से उत्पन्न हुए गुणों के कार्यरूप पदार्थों को भोगता है और इन गुणों का संग ही इस जीवात्मा के अच्छी तथा बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है। यह कारण अर्थात् प्रकृति